आतंकवाद के विरुद्ध भारत को अपनी लड़ाई खुद लड़नी होगी

अमेरिका ने पकिस्तान को दी जाने वाली सहायता राशियों को रोक दिया है| जिसके बाद भारत में एक ख़ुशी की लहर है| भारतीय मडिया इसे कुछ इस तरह से प्रचारित कर रही है की जैसे भारत ने एक निर्णायक जंग जित ली हो| सर्वप्रथम तो हमें ये याद रखना होगा की अमेरिका ने पहली बार पकिस्तान को मिलने वाला अनुदान नहीं रोका है| इस प्रकार पहले भी कितनी ही बार अमेरिका ने पकिस्तान के अनुदान रोके हैं जो बाद में दे भी दिए|

जहाँ तक आतंकवाद का प्रश्न है तो मुम्बई ताज हमले, या पठानकोट हमले या फिर उडी आतंकी हमले के समय भी अमेरिका की कोई कड़ी कार्यवाही पकिस्तान के विरुद्ध नहीं दिखी थी| यहाँ तक की अमेरिका के कट्टर शत्रु ओसामा के पकिस्तान में ही पाए जाने पर भी अमेरिका ने कोई बहुत कड़ी कार्यवाही पकिस्तान के विरुद्ध नहीं की| आखिर अभी क्या हुआ जो ये कार्यवाही अमेरिका की तरफ से हुई? भारत को आतंकवाद से कितना जूझना पड रहा है इससे अमेरिका को कभी कोई फर्क नहीं पड़ता| यहाँ कारण कुछ और है| पकिस्तान वर्तमान में विश्व का दसवां सबसे बड़ा हथियार आयातक देश है| 2015 में पकिस्तान ने 735 मिलियन डॉलर के हथियार विदेशो से आयात किये थे| और यहाँ ध्यान देने वाला तथ्य ये है की 2012 तक पकिस्तान अमेरिका से सबसे ज्यादा आयात करता था| परन्तु अब पकिस्तान को सबसे ज्यादा हथियारों की आपूर्ति चीन करता है| 2014 में चीन से पकिस्तान की 394 मिलयन डॉलर की सैन्य खरीद रही थी जो 2015 में 70% तक बढ़कर 565 मिलियन डॉलर तक पहुँच गयी| वहीँ अमेरिका से 2014 में पकिस्तान ने कुल 189 मिलयां डॉलर के हथियार ख़रीदे थे जो आंकड़ा 2015 में एक तिहाई घटकर 66 मिलियन डॉलर रह गया| अमेरिका का पकिस्तान को बड़ा रक्षा व्यापार अब खिसक कर चीन के हिस्से में जा चूका है| जिसका बहुत ज्यादा दर्द अमेरिका को हो रहा है| अमेरिका की आतंक विरोधी नीति रही हो या फिर किसी भी देश में शांति स्थापित करने का प्रयास, उसके पीछे अमेरिका का बड़ा आर्थिक और कुटनीतिक फायदा छुपा होता है| ISIS, अल कायदा या तालिबान (मुल्ला उमर) जैसे दुनिया के कुख्यात आतंकी संगठनों को स्थापित करने में अमेरिका का बड़ा योगदान रहा था| आज अमेरिका विश्व के सबसे बड़े हथियार निर्यातको में से एक है और चीन से उसे बड़ी चुनौती मिल रही है| सबसे महत्वपूर्ण तथ्य ये है की चीन पकिस्तान जैसे अमेरिका के पुराने ग्राहकों को ही अमेरिका से छीन रहा है| पकिस्तान में तो चीन ने अमेरिका से बहुत बड़ी बढ़त ले ली है और अब पकिस्तान के बहुत से प्राकृतिक संसाधनों पर भी चीन का ही अधिपत्य है|

वर्तमान में अमेरिका की पकिस्तान की मदद रोकने के पीछे आतंक के प्रति कोई कडा रुख नहीं है बल्कि अमेरिका दबाव की निती से अपने पुराने हथियारों के ग्राहकों को अपने साथ ही बनाये रखना चाहता है| यदि भारत अमेरिका के इस कदम में अपनी जीत देखता है तो ये एक बड़ी मुर्खता है| अमेरिका ने पहले भी कई बार पकिस्तान की आर्थिक मदद रोकी हैं लेकिन फिर बाद में दे भी दी| और अभी इस आर्थिक सहयता का भी भविष्य कुछ एसा ही होने की सम्भावना है| भारत को याद रखना होगा की भारत हो या पकिस्तान या फिर अन्य अरब देश अमेरिका को किसी भी देश के स्थायित्व या विश्व शांति से कोई सरोकार नहीं है बल्कि वह अपने विश्व महाशक्ति के दर्जे और व्यापार को बचाने और स्थापित करने के कुछ भी करेगा|

भारत को पकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद के विरुद्ध या चीन के विरुद्ध निर्णायक लड़ाई स्वयं ही लड़नी होगी| अमेरिका जैसे पूंजीवादी देशो के भरोसे पर भारत छला ही जायेगा|

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