न्यायिक लोकतंत्र, वैचारिक त्रासदी, कौन जिम्मेवार? – कमलेश पांडे

जिस तरह से सुप्रीम कोर्ट के अंदरूनी विवाद को चार विद्वान न्यायाधीशों द्वारा मीडिया के माध्यम से आमलोगों के बीच ले जाया गया, वह बेहद गम्भीर बात है। यह एक नई और अनापेक्षित परम्परा की शुरुआत है जो अनुचित है। इसके दूरगामी दुष्परिणामों का अंदाजा शायद इन विद्वान न्यायविदों ने भी नहीं लगाया होगा, या फिर कम लगाया हो। यह ठीक है कि देश-दुनिया को न्याय देने वाले लोगों को भी न्याय की दरकार होती है, लेकिन उन्हें यह समझना चाहिए कि यह किसी संविधान पीठ के द्वारा ही सम्भव है, जनहित के प्रति उत्तरदायी संसद के मार्फ़त ही सम्भव है, न कि जनअदालत के माध्यम से, जैसा कि उनलोगों ने दुस्साहस किया है।

मुझे नहीं लगता कि इससे इस संस्थागत/व्यवस्थागत समस्या का कोई सर्वमान्य हल निकल पायेगा, क्योंकि यह वरिष्ठ तथा उपवरिष्ठ व्यक्ति के व्यक्तित्व और उनके चहेते लोगों के परस्पर वैचारिक टकराव का नतीजा है जो किसी भी व्यवस्था के सुचारू रूप से चलने में बाधक साबित होता आया है। अबतक प्रचलित परम्परा के मुताबिक पदासीन किसी भी मुख्य अधिकारी/जज के निर्णयों का हर हाल में अनुपालन सुनिश्चित किया जाना चाहिए, और यदि ऐसा सम्भव नहीं हो तो उचित माध्यम से इसकी शिकायत दर्ज करनी-करवानी चाहिए जिसकी सुनवाई शीर्ष सक्षम अधिकारी करें, न कि इसे जनबहस का मुद्दा बनाया जाना चाहिए।

कहना न होगा कि लोकतंत्र मूर्खों का शासन है, यह भीड़तंत्र का हिमायती है, जबकि संवैधानिक संस्थाएं प्रबुद्ध तंत्र का प्रतीक हैं जो कतई भावनाओं में नहीं बहतीं। ये विवेकसम्मत और कानूनी तौर-तरीकों से कार्य करती हैं जिनके लिए अपवादस्वरूप अल्पमत/बहुमत का अमूमन फेर नहीं होता, बल्कि स्थापित परम्पराएं और कानून अहम मायने रखता है। इन्हीं के द्वारा व्यापक जनहित में किसी भी भीड़तंत्र/मूर्खतंत्र को नेक/वाजिब/सही रास्ता दिखाया जाता है, और यदि वो मुकरें तो भी प्रचलित परम्परा और कानून की दुहाई देकर उन्हें भी उस पर ही चलने के लिये बाध्य किया जाता है। यही वजह है कि न्यायालयों, चुनाव आयोगों, विभिन्न गठित आयोगों और नियमित/निर्धारित पेशेवर प्राधिकरणों के अंतिम निर्णयों का सम्मान प्रायः सभी जनप्रतिनिधि भी करते आये हैं कुछेक अपवादों को छोड़कर।

यही वजह है कि इन संस्थाओं में किसी भी स्तर पर वरिष्ठ और उपवरिष्ठ अधिकारी/जज या उनके गुटों के बीच पैदा हुए परस्पर मनमुटाव को हर हाल में हतोत्साहित किया जाना चाहिये। जहाँ जहाँ भी ऐसी स्थिति-परिस्थिति उत्प्न्न हो, वहां बहुमत के साथ साथ व्यवस्थागत मूल्यों का भी ज्यादा ख्याल रखना चाहिए। सबसे वरिष्ठ और योग्य व्यक्ति के सम्मान की परंपरा विकसित की जानी चाहिए, क्योंकि वह किसी भी पद पर कुछेक दिनों/महीनों/वर्षों के लिये ही आता है, स्थायी रूप से नहीं रहता। लिहाजा, यदि वह कुछ गलत भी करता है तो या तो उसे विधिसम्मत तरीके से पदच्युत करें, या फिर उसका तबादला कर-करवा दिया जाय, और यदि इस बात की भी गुंजाइश नहीं हो तो असहमत अधिकारी/जज लोग धैर्य से काम लें, क्योंकि परवर्ती मुख्य अधिकारी/जज भविष्य में उसके किसी भी गलत निर्णय में सुधार सकता है। इससे फायदा यह होगा कि सिस्टम अक्षुण्ण रहेगा, सुचारू रूप से चलेगा और उसकी गरिमा भी बची/बनी रहेगी।

दो टूक कहें तो सुप्रीम कोर्ट के अंदरूनी विवाद के सतह पर आ जाने से अब यह स्वतः साबित हो गया है कि देश में सुप्रीम कोर्ट नहीं, बल्कि संसद सर्वोच्च है जो सीधे जनता के प्रति जवाबदेह होती है। संसद के समानांतर मीडिया सर्वोच्च है जो विधायिका, कार्यपालिका, न्यायपालिका और जनता के बीच परस्पर विवेकसम्मत कड़ी के रूप में कार्य ही नहीं करती, बल्कि एक दूसरे को उसके स्थानीय, क्षेत्रीय, राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय हितों के विषय में जागरूक करती है। कहना न होगा कि यदि न्यायपालिका और मीडिया के बीच कुछ अविवेकी बंदिशें नहीं लगाई गई होतीं तो स्थिति आज जितनी जटिल भी नहीं होती।
दो टूक कहें तो न्यायपालिका के लिये मीडिया भी यदि ‘सेफ्टी वॉल्व’ का कार्य करती और उनके अंदरूनी विवादों को भी जब अखबारों की सुर्खियां बनाती तो फिर कोई भी शीर्ष विद्वान जज वैसी मनमानी करने से परहेज करता जैसी की चर्चा चार विद्वान न्यायाधीशों ने मुख्य न्यायाधीश को लिखे अपने खत में की है। इसलिये जब आपलोग मीडिया के बीच आ ही गए तो मीडियाकर्मियों के लिये खींची गई अपनी लक्ष्मण रेखाओं को अब तो हटा ही लीजिये, क्योंकि हमलोग सही या गलत जो कुछ भी करते हैं तो उसका एकमात्र पुनीत मकसद होता है जनता को जागरूक करना, जिसकी अपेक्षा 70 साल बाद ही सही, लेकिन अब आपलोगों ने भी कर ही ली है।

हैरत की बात तो यह है कि केंद्र सरकार ने इस पूरे सुलगते सवाल पर उम्मीदों के विपरीत बिल्कुल ठंडी प्रतिक्रिया दी, वह यह कि हमारी न्यायपालिका विश्वभर में प्रतिष्ठित है, स्वतंत्र है और मामले को खुद ही सुलझा लेगी। सरकार की ये बातें निराशा पैदा करती हैं। इससे साफ है कि वह भी अभिभावक की अपनी नैसर्गिक भूमिका को भी खुद ही गंवा रही है जिससे भविष्य में न्यायिक विसंगतियों के आसार बढ़ेंगे। उचित होगा कि केंद्र सरकार इस पूरे प्रकरण की न्यायिक जांच और सम्यक नीति निर्धारण के लिये किसी भी निवर्तमान मुख्य न्यायधीश के नेतृत्व और सदस्यता वाली किसी न्यायिक जांच आयोग का गठन करे जो कि निर्धारित न्यूनतम समय में अपनी अंतरिम व्यवस्था और फिर अपना पूरा निर्णय दे, जिसे बिना किंतु-परन्तु किये लागू किया जाय।

और केंद्र सरकार द्वारा ऐसा करना यदि सम्भव नहीं है तो फिर कायदे से भारत के मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा को खुद ही अपने खिलाफ उठाये गए कतिपय अहम विषय पर अपनी चुप्पी तोड़कर पूर्ण प्रकाश डालें और फिर सेवानिवृत मुख्यन्यायाधीशों वाली एक अनापेक्षित संविधानपीठ का गठन करें जो तत्काल अपनी अन्तरिम व्यवस्था दे और उसके बाद त्वरित गति से अपना उचित निर्णय दें जो बाध्यकारी हो, समान रूप से अन्य सभी पक्षों पर। सम्भव हो तो मुख्य न्यायाधीश और अधीनस्थ न्यायाधीशों के बीच कार्यविभाजन में चक्रानुक्रम प्रणाली (रोटेशनल सिस्टम) को भी लागू कर दिया जाय।

यह कितनी गम्भीर बात है कि परस्पर वैचारिक टकराव वश चार विद्वान न्यायाधीश जे. चेलमेश्वर, रंजन गोगोई, मदन बी लोकुर और कुरियन जोसेफ खुलेआम तौर पर कह रहे हैं कि “सुप्रीम कोर्ट में हालात सही नहीं हैं। सर्वोच्च न्यायपालिका में बहुत सी ऐसी चीजें हो रही हैं जो वांछनीयता से नीचे हैं। संस्थान को नहीं बचाया गया तो देश में लोकतंत्र नष्ट हो सकता है। यदि न्यायपालिका की स्वतंत्रता नहीं रहेगी तो देश में लोकतंत्र नहीं बच सकता।” इतना कुछ कह देने के बावजूद भी ताज्जुब होता है जब एक विद्वान जज कह रहे हैं कि ‘उनका यह कदम सुप्रीम कोर्ट में सीजेआई के खिलाफ़ बगावत जैसा नहीं है, बल्कि हम अपनी बात रख रहे हैं और हमने देश को अपना कर्ज चुका दिया।’ और जब उनलोगों से यह पूछा गया कि क्या वह सीजेआई के लिये महाभियोग की सिफारिश करेंगे तो दूसरे विद्वान जज ने कहा कि ‘इस पर देश को ही फैसला करने दीजिये।’

लेकिन सीधा और सुलगता सवाल है कि दिन प्रतिदिन पूंजीवादी शिकंजे में जकड़ता जा रहा लोकतंत्र और देश अब करेगा क्या? जब हमारी संसद, हमारे सचिवालय, हमारी न्यायपालिका और हमारी मीडिया, सभी मिलकर पूंजीवाद के प्रबल पैरोकार बन चुके हैं तब पूंजीवादी शिकंजे में तड़फड़ाते मुट्ठीभर संवेदनशील जनमानस को बचाएगा कौन? यह लोकतंत्र? कतई नहीं? इसलिये यह खतरे में रहे या फिर खतरे से बाहर रहे! सुशिक्षित जनता अब यह समझ चुकी है कि लोकतंत्र महज एक ढकोसला है, इससे ज्यादा कुछ भी नहीं! यह भी अब जनशोषण-जनदोहन का प्रशासनिक औजार बन चुका है, जिसकी जितनी निंदा की जाए वह कम है।

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