साहित्य अकादेमी का 64वाँ स्थापना दिवस पर ज्ञान के चार स्तंभ विषय पर कर्ण सिंह का व्याख्यान

नई दिल्ली / साहित्य अकादेमी के 64वें स्थापना दिवस पर अपना व्याख्यान देते हुए प्रसिद्ध शिक्षाविद्, लेखक, विचारक एवं राजनीतिज्ञ डॉ. कर्ण सिंह ने कहा कि ये दुनिया ज्ञान, कर्म, सहजीवन और आत्म योग से बची रह पाएगी। उन्होंने ज्ञान के चार स्तंभ विषयक अपने व्याख्यान में कहा कि ज्ञान यानी शिक्षा व्यवस्था, जोकि हमारी परंपरा में संवाद के आधार पर स्थापित थी, आज संवादहीन हो गई है। उन्होंने वेद, उपनिषद्, गीता, बौद्ध एवं जैन ग्रंथों के उदाहरण देकर बताया कि हमारी शिक्षा हमेशा से संवाद की बुनियाद पर केंद्रित रही है। लेकिन इधर यह परंपरा खत्म-सी होती जा रही है और यह पूरी तरह से अंकपाने या खासतरह की नौकरियाँ पाने का साधन मात्र बनकर रह गई हैं।

ज्ञान के दूसरे स्तंभ यानी कर्मयोग के बारे में स्पष्ट करते हुए उन्होंने कहा कि हमारा काम के प्रति एक सार्थक नजरिया होना चाहिए; तथा हमें किसी भी काम को छोटा नहीं समझना चाहिए। हर काम अपनी जगह सार्थक और आवश्यक है। ज्ञान के तीसरे स्तंभ के रूप में उन्होंने सहजीवन को रेखांकित किया। उन्होंने भारत की वैविध्यपूर्ण सभ्यता-संस्कृति को संदर्भित करते हुए कहा कि यही भारत की पहचान और ताकत है। उन्होंने सहजीवन के लिए पाँच प्रमुख मूल्यों पर बात की -पारिवारिक, सामाजिक, अंतर्फलकीय, पारिस्थितिकीय एवं भूमंडलीय। ज्ञान के चौथे स्तंभ के रूप में उन्होंने आत्म योग की चर्चा करते हुए कहा कि स्वयं पर विश्वास विकास का प्रमुख चरण है और सभी महत्त्वपूर्ण धर्मों में इस पर व्यापक विमर्श हुआ है। कार्यक्रम के अंत में उन्होंने श्रोताओं की जिज्ञासाओं के समुचित समाधान भी प्रस्तुत किए। एक प्रश्न के उत्तर में उन्होंने कहा कि ‘सेकुलर’ शब्द को अनेक तरह से परिभाषित किया गया है, लेकिन भारतीय दर्शन की परंपरा में इस की परिभाषा ‘सर्वधर्म समभाव’ ही है। आरंभ में अकादेमी के सचिव डॉ. के. श्री निवास राव ने औपचारिक स्वागत करते हुए डॉ. कर्ण सिंह का संक्षिप्त परिचय प्रस्तुत किया तथा साहित्य अकादेमी की गतिविधियों एवं उपलब्धियों को रेखांकित किया। साहित्य अकादेमी को लेखकों का घरबताते हुए उन्होंने कहा किले खकों के व्यापक एवं सशक्त सहयोग के कारण ही अकादेमी निरंतर प्रगति के पथ पर अग्रसर है।

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