दुख

कैसी बेटी कैसे बेटे ।
अगर माँ बाप रोते।।
माँ बाप के दुख ।
सारे रिश्तेदार चुप ।।
हर व्यक्ति मजे लेता है ।
कौन किसी का होता है ।।
तुझे भी बुढापा आएगा ।
बता फिर कहाँ जाएगा ।।
पल पल घट रही है उम्र ।
चल मिलकर करते है शर्म ।।
रोटी रोटी को माँ बाप हताश ।
बेटा हर पल पास ।।
झूठे सपने अपने दिखाते है ।
अपना खोकला चेहरा दिखाते है ।।
शर्मिंदगी भी खुद शर्मिंदा है ।
घटिया लोग अभी जिंदा है ।।
बाप की टूट गयी सारी आस ।
कल जिसे तेरे पैदा होने की थी आस ।।
माँ भी कहीं अंदर से है उदाश ।
तू ठीक रहे बस इतनी आस ।

– नीरज त्यागी

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