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    Categories: काव्य-उल्लेख

छलती मंजिल

मंजिल को जाते हुए ना जाने कब कदम लड़खड़ा गए।

हसरते भी मर गयी और अब हम भी वक्त से घबरा गए।।

मैं चला था लग्न से पर वक्त ने राह उलटी ही पकड़ ली।

चला मैं बड़ी शिद्दत से,पर मंजिल ने दूरी दुगुनी पकड़ ली।।

कोई शिद्दत से खटखटा कर रह जाता है भाग्य का दरवाजा

और किसी के घर जाकर भाग्य खुद दरवाजा खटखटा रहा।

मंजिल खुद मिलेगी उसे जिसके हाथों में वक्त का हाथ है।

वक्त का मारा मंजिल पर पहुँचकर ही ठोकर खायेगा।।

माना बड़े से हरे भरे वृक्ष को जड़ो का भी साथ हो।

क्या करेंगी जड़े भी जब वृक्ष लगा समंदर के पास हो।।

बड़े से बड़ा वृक्ष भी जल्द ही धड़ाम से गिर जाएगा।

क्या करेंगी जड़े भी जब किनारे पर खड़े वृक्ष

की जड़े रोज समंदर की लहरों से चोट खाएंगी।।

कई बार कहते सुना है मैंने लोगो को के मंजिल पर

जाते हुए तेरे प्रयासो में कभी कमी कोई ना हो।

क्या करे कोई अगर प्रयासो के साथ वो  किस्मत का धनी ना हो।।

नीरज त्यागी

This article was last modified on February 2, 2019 5:10 AM

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