नवरात्रि के प्रत्येक दिन देवी अंबे के विभिन्न स्वरूपों की आराधना की जाती है। वर्ष 2026 में, नवरात्रि का दूसरा दिन 20 मार्च को मनाया जाएगा। इस दिन मां ब्रह्मचारिणी की पूजा की जाती है, जो भक्तों को शुभ और अनंत फल प्रदान करने वाली मानी जाती हैं। उनका स्वरूप शांति और तपस्या का प्रतीक है, जिसमें वे श्वेत वस्त्र पहनकर संजीवता का परिचय देती हैं। उनके दाहिने हाथ में जप माला और बाएँ हाथ में कमंडल होते हैं, जो साधना और त्याग का संदेश देते हैं। आइए जानते हैं इस दिन मां ब्रह्मचारिणी को प्रसन्न करने के लिए कौन सा भोग अर्पित करें, कौन सा मंत्र जपें और उनकी आरती कैसे करें।

(माता ब्रह्मचारिणी की आरती)
जय अंबे ब्रह्माचारिणी माता। जय चतुरानन प्रिय सुख दाता।

ब्रह्मा जी के मन भाती हो। ज्ञान सभी को सिखलाती हो।
ब्रह्मा मंत्र है जाप तुम्हारा। जिसको जपे सकल संसारा।
जय गायत्री वेद की माता। जो मन निस दिन तुम्हें ध्याता।
कमी कोई रहने न पाए। कोई भी दुख सहने न पाए।
उसकी विरति रहे ठिकाने। जो तेरी महिमा को जाने।
रुद्राक्ष की माला ले कर। जपे जो मंत्र श्रद्धा दे कर।
आलस छोड़ करे गुणगाना। मां तुम उसको सुख पहुंचाना।
ब्रह्माचारिणी तेरो नाम। पूर्ण करो सब मेरे काम।
भक्त तेरे चरणों का पुजारी। रखना लाज मेरी महतारी।

मां ब्रह्मचारिणी का मंत्र ध्यान और शुभकामनाओं के लिए मंत्र साधना का महत्वपूर्ण भाग है। सामान्य रूप से इसे इस प्रकार प्रस्तुत किया जाता है:

ॐ देवी ब्रह्मचारिण्यै नमः

दधाना करपद्माभ्यामक्षमाला कमण्डलु। देवी प्रसीदतु मयि ब्रह्मचारिण्यनुत्तमा।।

यह मंत्र माँ ब्रह्मचारिणी की पूजा और उनकी कृपा प्राप्त करने के लिए विशेष रूप से उपयोग में लाया जाता है।

ध्यान मंत्र

वन्दे वाञ्छितलाभाय चन्द्रार्धकृतशेखराम्।
जपमाला कमण्डलु धरा ब्रह्मचारिणी शुभाम्॥
गौरवर्णा स्वाधिष्ठानस्थिता द्वितीय दुर्गा त्रिनेत्राम्।
धवल परिधाना ब्रह्मरूपा पुष्पालङ्कार भूषिताम्॥
परम वन्दना पल्लवाधरां कान्त कपोला पीन।
पयोधराम् कमनीया लावणयं स्मेरमुखी निम्ननाभि नितम्बनीम्॥

स्त्रोत

तपश्चारिणी त्वंहि तापत्रय निवारणीम्।
ब्रह्मरूपधरा ब्रह्मचारिणी प्रणमाम्यहम्॥
शङ्करप्रिया त्वंहि भुक्ति-मुक्ति दायिनी।
शान्तिदा ज्ञानदा ब्रह्मचारिणी प्रणमाम्यहम्॥

कवच मंत्र

त्रिपुरा में हृदयम् पातु ललाटे पातु शङ्करभामिनी।
अर्पण सदापातु नेत्रो, अर्धरी च कपोलो॥
पञ्चदशी कण्ठे पातु मध्यदेशे पातु महेश्वरी॥
षोडशी सदापातु नाभो गृहो च पादयो।
अङ्ग प्रत्यङ्ग सतत पातु ब्रह्मचारिणी॥

मां ब्रह्मचारिणी को अर्पित किए जाने वाले भोग में शामिल हैं: शक्कर, मिश्री, खीर, और दूध।

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