स्पेसएक्स का एक स्टारलिंक सैटेलाइट 17 दिसंबर को अनियंत्रित होकर अंतरिक्ष में घूम रहा है और जल्द ही पृथ्वी के वायुमंडल में प्रवेश कर जलकर नष्ट हो जाएगा। एक नई रिसर्च बताती है कि यदि सैटेलाइट्स नियंत्रण खो देते हैं, तो केवल 2.8 दिनों में केसलर सिंड्रोम शुरू हो सकता है। इसका असर इतना व्यापक होगा कि इंटरनेट, जीपीएस, बैंकिंग सेवाएं और मौसम पूर्वानुमान सब कुछ ठप हो सकता है।

इस घटना की जांच के लिए स्पेसएक्स ने वैंटर कंपनी के वर्ल्डव्यू-3 सैटेलाइट का उपयोग किया, जिसने 241 किलोमीटर की दूरी से उच्च-रिजॉल्यूशन तस्वीरें कैप्चर कीं। इन तस्वीरों में सैटेलाइट के सोलर पैनल पूरी तरह फैले हुए दिखते हैं, लेकिन वे क्षतिग्रस्त अवस्था में हैं। यह घटना अंतरिक्ष में बढ़ते मलबे और संभावित टकराव के खतरों को स्पष्ट रूप से उजागर करती है।

क्या हुआ था?

सैटेलाइट नंबर 35956, जो 418 किलोमीटर की ऊंचाई पर मौजूद था, अचानक नियंत्रण से बाहर हो गया। प्रोपल्शन टैंक फटने जैसी समस्या के चलते गैस का रिसाव हुआ, जिससे इसकी ऊंचाई 4 किलोमीटर कम हो गई और इससे छोटे-छोटे मलबे भी बने। स्पेसएक्स ने बताया कि इसके चलते कोई बड़ा खतरा नहीं है – यह सैटेलाइट वायुमंडल में गिरते ही पूरी तरह जल जाएगा। हालांकि, यह घटना इस बात की ओर संकेत करती है कि मेगा-कॉन्स्टेलेशन (हजारों सैटेलाइट्स) की वजह से अंतरिक्ष अब पहले से कहीं अधिक जोखिम भरा हो चुका है। स्टारलिंक के पास फिलहाल 9,000 से अधिक सक्रिय सैटेलाइट्स हैं, जो कुल सक्रिय सैटेलाइट्स का एक बड़ा हिस्सा बनाते हैं।

केसलर सिंड्रोम का खतरा:

अंतरिक्ष में ‘ताश के पत्तों का महल’ एक हालिया शोध पत्र “एन ऑर्बिटल हाउस ऑफ कार्ड्स” (arXiv, 2025) के अनुसार, निचली पृथ्वी कक्षा (लो अर्थ ऑर्बिट या LEO) में सैटेलाइट्स की संख्या तेजी से बढ़ रही है, जिससे संभावित खतरे काफी बढ़ गए हैं। वर्तमान में हर 22 सेकंड में दो सैटेलाइट्स एक किलोमीटर के दायरे में एक-दूसरे के नज़दीक से गुजरते हैं। स्टारलिंक नेटवर्क के मामले में यह स्थिति हर 11 मिनट में होती है। यदि किसी वजह से सैटेलाइट्स अपना नियंत्रण खो दें, जैसे कि किसी भारी सौर तूफान के कारण, तो केवल 2.8 दिनों के भीतर महाविनाशकारी टक्कर हो सकती है। यह आंकड़ा 2018 में 121 दिनों के करीब था, लेकिन मेगा-कॉन्स्टेलेशन के कारण यह समय खतरनाक रूप से कम हो गया है। केसलर सिंड्रोम की स्थिति तब उत्पन्न होती है जब एक टक्कर मलबा उत्पन्न करती है, जो आगे टक्करों की श्रृंखला को जन्म देता है। यह एक चेन रिएक्शन जैसा बन जाता है और अंततः अंतरिक्ष इतना मलबे से भर सकता है कि नई लॉन्चिंग असंभव हो जाए।

इंटरनेट और संचार का ठप होना: स्टारलिंक जैसे उपग्रहों के जरिए दुनियाभर में इंटरनेट प्रदान किया जाता है। अगर हजारों उपग्रह नष्ट हो गए तो, खासकर दूरदराज के इलाकों में, इंटरनेट सेवा बाधित हो जाएगी। मोबाइल नेटवर्क, वीडियो कॉल और ऑनलाइन बैंकिंग जैसी सुविधाएं प्रभावित होंगी।

जीपीएस और नेविगेशन संबंधी चुनौतियां: वाहनों, जहाजों, और विमानों का संचालन जीपीएस पर निर्भर करता है। इसके बिना, दुर्घटनाओं का खतरा बढ़ जाएगा और परिवहन व्यवस्था पूरी तरह से ठप हो सकती है।

बैंकिंग और आर्थिक प्रणाली पर प्रभाव: शेयर बाजार और ऑनलाइन लेन-देन सटीक सैटेलाइट टाइमिंग पर आधारित हैं। यदि ये सेवाएं कुछ दिनों तक बंद रहीं, तो अर्थव्यवस्था को अरबों डॉलर का नुकसान झेलना पड़ सकता है।

मौसम की जानकारी और आपदा चेतावनी: मौसम पूर्वानुमान के लिए सैटेलाइट्स बेहद महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इनकी अनुपस्थिति में तूफान और बाढ़ जैसी आपदाओं से जुड़ी चेतावनियां देरी से मिलेंगी, जिससे जान-माल का अधिक नुकसान होगा।

रक्षा और सुरक्षा पर असर: निगरानी के लिए सैटेलाइट्स का उपयोग किया जाता है। इनके बिना आतंकवाद विरोधी अभियानों या युद्ध संबंधी गतिविधियों में कमजोरी आ सकती है।

वैज्ञानिक अनुसंधान पर विराम: अंतरिक्ष स्टेशन और दूरबीन जैसे उपकरण भी प्रभावित होंगे। इसके साथ ही नए अंतरिक्ष मिशन बाधित हो सकते हैं।

दीर्घकालिक खतरा: यदि केसलर सिंड्रोम जैसी स्थिति उत्पन्न हुई तो दशकों तक अंतरिक्ष में जाना बेहद मुश्किल हो सकता है। मानव अंतरिक्ष यात्रा पर भी इसका नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है।

स्पेसएक्स का दावा है कि वे सुरक्षा को प्राथमिकता देते हैं और उनके सैटेलाइट्स टकराव से खुद को बचा सकते हैं। हालांकि, शोध बताते हैं कि संभावित खतरों में बढ़ोतरी हो रही है। इस संदर्भ में, अंतरराष्ट्रीय नियमों का पालन और मलबा हटाने की तकनीकों का विकास अनिवार्य हो गया है। यह घटना यह भी दर्शाती है कि अंतरिक्ष अब कितना संवेदनशील हो चुका है – जहां एक मामूली चूक भी बड़े संकट का कारण बन सकती है।

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