किसी भी समाज की प्रगति का वास्तविक आकलन उसके सबसे संवेदनशील वर्ग – माँ और शिशु की स्थिति से किया जा सकता है। 11 अप्रैल को मनाया जाने वाला राष्ट्रीय सुरक्षित मातृत्व दिवस हमें यह स्मरण कराता है कि मातृत्व केवल एक जैविक प्रक्रिया नहीं, बल्कि जीवन की निरंतरता, संस्कारों की परंपरा और समाज की स्थिरता का आधार है।

भारतीय संस्कृति में माँ को सृष्टि का प्रथम गुरु और पालनकर्ता माना गया है। “मातृ देवो भवः” की भावना केवल एक आदर्श नहीं, बल्कि हमारे सामाजिक ताने-बाने की मूल चेतना है। इसके बावजूद यह एक कटु सत्य है कि आज भी अनेक महिलाएँ गर्भावस्था और प्रसव के दौरान आवश्यक स्वास्थ्य सुविधाओं से वंचित रह जाती हैं। यह स्थिति केवल चिकित्सा व्यवस्था की कमी नहीं, बल्कि सामाजिक असमानता, जागरूकता के अभाव और संसाधनों के असंतुलन का परिणाम है।

सुरक्षित मातृत्व का अर्थ केवल प्रसव के समय चिकित्सकीय सहायता उपलब्ध कराना नहीं है, बल्कि यह एक सतत प्रक्रिया है—जिसमें गर्भधारण से पूर्व स्वास्थ्य जागरूकता, गर्भावस्था के दौरान नियमित जाँच, संतुलित पोषण, मानसिक समर्थन और प्रसव के बाद माँ एवं शिशु की देखभाल शामिल है। यदि इन सभी पहलुओं को समुचित रूप से सुनिश्चित किया जाए, तो मातृ एवं शिशु मृत्यु दर में उल्लेखनीय कमी लाई जा सकती है।

ग्रामीण भारत और दूरस्थ क्षेत्रों में यह चुनौती और भी गंभीर हो जाती है। वहाँ स्वास्थ्य सेवाओं की सीमित उपलब्धता,प्रशिक्षित चिकित्सकों की कमी और सामाजिक रूढ़ियाँ मिलकर स्थिति को जटिल बना देती हैं। कई बार महिलाएँ प्रसव के समय तक किसी भी प्रकार की चिकित्सकीय जाँच नहीं करातीं, जिससे जटिलताओं का खतरा बढ़ जाता है। इस संदर्भ में आशा कार्यकर्ताओं, आंगनवाड़ी सेवाओं और प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाती है।

सुरक्षित मातृत्व केवल स्वास्थ्य का विषय नहीं, बल्कि महिला सशक्तिकरण से भी जुड़ा हुआ है। जब एक महिला शिक्षित और जागरूक होती है, तो वह अपने स्वास्थ्य के प्रति अधिक सजग रहती है और सही निर्णय लेने में सक्षम होती है। इसलिए शिक्षा, पोषण और स्वास्थ्य सेवाओं का समन्वय आवश्यक है, ताकि मातृत्व एक सुरक्षित और सम्मानजनक अनुभव बन सके।

सरकार द्वारा चलाई जा रही विभिन्न योजनाएँ जैसे जननी सुरक्षा योजना, प्रधानमंत्री मातृ वंदना योजना-इस दिशा में महत्वपूर्ण प्रयास हैं। इन योजनाओं का उद्देश्य केवल आर्थिक सहायता देना नहीं, बल्कि महिलाओं को संस्थागत प्रसव के लिए प्रोत्साहित करना और स्वास्थ्य सेवाओं तक उनकी पहुँच सुनिश्चित करना है। हालांकि, इन योजनाओं का प्रभाव तभी पूर्ण रूप से दिखाई देगा, जब समाज के प्रत्येक वर्ग तक इनकी जानकारी और लाभ पहुँच सके।इसके साथ ही, परिवार और समाज की भूमिका भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। गर्भवती महिला को केवल चिकित्सा सहायता ही नहीं, बल्कि भावनात्मक समर्थन और सम्मान की भी आवश्यकता होती है। एक सकारात्मक और सहयोगी वातावरण ही स्वस्थ मातृत्व का आधार बन सकता है।

यह भी आवश्यक है कि हम मातृत्व को केवल “महिला की जिम्मेदारी” के रूप में न देखें, बल्कि इसे परिवार और समाज की साझा जिम्मेदारी के रूप में स्वीकार करें। जब तक पुरुष, परिवार और समाज इस प्रक्रिया में सक्रिय रूप से सहभागी नहीं होंगे, तब तक सुरक्षित मातृत्व का लक्ष्य अधूरा रहेगा।

अंत में यह लिखना भी लाजिमी है कि राष्ट्रीय सुरक्षित मातृत्व दिवस हमें यह संदेश देता है कि एक स्वस्थ माँ ही एक स्वस्थ पीढ़ी का निर्माण करती है। यदि हम वास्तव में एक सशक्त और समृद्ध राष्ट्र का निर्माण करना चाहते हैं, तो हमें मातृत्व की सुरक्षा, सम्मान और देखभाल को सर्वोच्च प्राथमिकता देनी होगी।

माँ केवल जीवन को जन्म नहीं देती, बल्कि वह भविष्य को आकार देती है और उस भविष्य की सुरक्षा हमारे आज के संकल्प पर निर्भर करती है।

— सुरेश सिंह बैस ‘शाश्वत’

एवीके न्यूज सर्विस

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