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    Categories: काव्य-उल्लेख

नारी : महकते फूलों की क्यारी

उपवन सारे महक रहे हैं ,
     महक रही है क्यारियाँ |
     धन्य भूमि वो हो जाती,
   जहाँ पूजी जाती नारियाँ ||

नारी के बिन तो सूना है,
घर का कोना-कोना |
फिर क्यों आदमी समझता है इसे,
महज चाबी भरा खिलौना  ||

परिवार का रक्षाकवच बन,
खड़ी रहे दिन-रात |
मन-ही-मन कोमलता धर,
हल करती हर जज़्बात  ||

सहनशील तुझ-सा जग में,
ना देखा कोई ओर |
जग की तु ही पालनहारी,
तु ही है सिरमौर  ||

तु सहज है, तु सरल है,
मैं दास हूँ तेरी ममता का |
गरल पिएँ तु अमृत समझ,
मुझे दे आशीष ,ऐसी क्षमता का  ||

बेटी, बहू, माँ और दादी,
तुम कितनी भूमिका निभाती हो |
ईश्वर भी तुमको नमन करे,
जब शौर्य तुम अपना दिखाती हो  ||

तुम बन कर के अर्धांगिनी,
करती हो प्रीतम की पूजा |
बस एक ही राह तुम चलती हो,
कोई मिले न पथ पर राही तुम्हें दूजा ||

तुझ-सा निर्मल, तुझ-सा दानी,
कोई ओर नहीं है जग में |
नारी तेरा ही लहू भरा है ,
इस “शेलु” की रग-रग में  ||

रचना- सुनील पोरवाल “शेलु”

This article was last modified on March 8, 2019 4:23 AM

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