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    Categories: काव्य-उल्लेख

सरकार बने बिंदास

बंदर जैसे उछल रहे, कुछ लोग टिकट के वास्ते,
बदल रहे हैं रंग अपना, और बदल रहे हैं रास्ते |
कोई रिझाए भाषण देकर, कोई रिझाए धन से,
देखो कैसे ये चरण चूम रहे, हे भगवन! बेमन से ||

चेहरे का ये बदल मुखौटा, भक्ति करे है राम की,
छेड़े तो फिर पूर्ण करे, जो बात करे संग्राम की |
ना मंदिर का निर्माण हुआ, ना अत्याचार पर रोक लगी,
नारी की रक्षा के लिए, किस आंदोलन की अलख जगी ||

मन मेरा हो बैचेन कहे, सत्ता अब कहाँ सुरक्षित है,
जनता सोच रही कि, किस सरकार में अपना हित है |
अब तो हर दल का नेता , बिन पैंदे का लौटा लगे,
कमा नहीं सकता तो, भोली-भाली जनता को ठगे ||

जनता ने खूब करी है, बौछार तुम पर वोटों की,
और लोकतंत्र की हत्या कर दी, देकर रिश्वत नोटों की |
अरे जरा तो शर्म करो, ओ! लोकतंत्र के हत्यारों, निर्दोष-सी जनता को तुम, भय दिखाकर ना मारो,

उम्मीद करें क्या, राजसिंहासन पर बैठे सम्राटों से,
जो नोंच रहे हो जनता को, तीरों से और काँटों से |
आने वाली सरकार हो मजबूत और निष्पाप ,करूँ मैं ऐसी आस,
“शेलु” तो बस यही चाहे, सरकार बने बिंदास ||

**सुनील पोरवाल “शेलु”

This article was last modified on March 15, 2019 1:38 AM

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