नई दिल्ली, 11 मई। नीति आयोग के सदस्य डॉ. गोबर्धन दास ने कहा कि जॉन डाल्टन से लगभग 2500 साल पहले हमारे ऋषि महर्षि कणाद ने परमाणु के सिद्धांत का प्रतिपादन किया था। डॉ. गोबर्धन दास इंद्रप्रस्थ विज्ञान भारती एवं दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रौद्योगिकी संकाय द्वारा दिल्ली विश्वविद्यालय के वाइसरीगल लॉज स्थित कन्वेंशन हॉल में आयोजित ‘राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी दिवस’ समारोह में बतौर मुख्य अतिथि संबोधित कर रहे थे। इस अवसर पर दिल्ली की मुख्यमंत्री श्रीमती रेखा गुप्ता ने अपने वीडियो संदेश में इस आयोजन के लिए इंद्रप्रस्थ विज्ञान भारती एवं दिल्ली विश्वविद्यालय को बधाई दी। कार्यक्रम के दौरान ‘विद्यार्थी विज्ञान मंथन’ ब्रोशर भी जारी किया गया।
डॉ. गोबर्धन दास ने अपने संबोधन में आगे कहा कि हमारे एक हजार वर्ष के गुलामी के काल में हमारी वैज्ञानिक प्रगति में गिरावट आई। पहले हमारा ज्ञान का भंडार इतना अधिक था, जिसे आतताइयों द्वारा नष्ट कर दिया गया। हमारा ज्ञान का भंडार इतना था कि नालंदा की लाइब्रेरी जलाने में भी उन्हें 9 महीने से ऊपर समय लगा। आज भारत फिर से प्रगति कर रहा है। कोविड-19 महामारी में हमारे वैज्ञानिकों ने दुनिया को दिखा दिया कि हम इतनी वैक्सीन बना सकते हैं कि भारत के साथ दूसरे देशों को भी सप्लाई कर सकें। आज दुनिया में सबसे ज्यादा यूपीआई ट्रांजैक्शन भारत में होती है। आज भारत उस स्थिति में है कि किसी के भी घर में घुस कर मार सकता है। यह सब आप-हम और देश के नागरिकों ने किया है। विश्व का 25% थोरियम भारत में है। हमारे वैज्ञानिक उस पर काम कर रहे हैं। आने वाले 10 वर्षों में भारत ऊर्जा में आत्मनिर्भर बन जाएगा।
समारोह की अध्यक्षता करते हुए डीयू कुलपति प्रो. योगेश सिंह ने कहा कि हमने 800 वर्षों की गुलामी, शर्मिंदगी, अपमान और अधीनता को सहा है। इसका मुख्य कारण यह था कि हमारे पूर्वज प्रौद्योगिकी की प्रगति के साथ कदमताल नहीं कर पाए। उस 800 साल की दासता को हमें भूलना नहीं चाहिए। तभी हम इस देश की ग्रोथ और डेवलपमेंट को सही दिशा में ले जा सकते हैं। कुलपति ने कहा कि राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी दिवस हमें प्रेरणा देता है कि हमें प्रौद्योगिकी के मामले में समझौता नहीं करना है। यदि हम तकनीक और प्रौद्योगिकी विकसित कर सकते हैं तो विकसित करें, यदि किसी कारण से हम प्रौद्योगिकी विकसित नहीं कर सकते तो उसे खरीदें और यदि खरीद नहीं सकते तो दूसरों के साथ प्रौद्योगिकी पर सहभागिता करें; यह हमारे देश के लिए बहुत जरूरी है। इनोवेशन, ओरिजिनेलिटी एंव क्रिएविटी ये तीन शब्द हमारे सभी उच्चतर शिक्षण संस्थानों के लिए बहुत जरूरी हैं। यह अनुसंधान और उद्यमिता को बढ़ाएंगे। जब हम पाठ्यचर्या डिजाइन करें तो इन 4-5 शब्दों को ध्यान में रखें। विश्वविद्यालयों को इन शब्दों पर फोकस रखना जरूरी है।
कार्यक्रम के विशिष्ट अतिथि विवेकानन्द पाई (राष्ट्रीय महासचिव, विज्ञान भारती) ने अपने संबोधन में कहा कि जब तक भारतीय भाषाओं में विज्ञान आगे नहीं आएगा, तो यह 140 करोड़ लोगों तक नहीं पहुँच पाएगा। उन्होंने कहा कि विज्ञान भर्ती इसमें प्रयास कर रही है। कार्यक्रम के आरंभ में इंद्रप्रस्थ विज्ञान भारती के अध्यक्ष प्रो. अविनाश चंद्र पांडे ने स्वागत सम्बोधन प्रस्तुत किया। कार्यक्रम के पहले स्तर के समापन पर डीयू के डीन ऑफ कॉलेजेज़ प्रो. बलराम पाणी ने धन्यवाद ज्ञापन प्रस्तुत किया। इस अवसर पर दक्षिणी परिसर की निदेशक प्रो. पायल मागो, रजिस्ट्रार डॉ विकास गुप्ता, एफ़ओटी के डीन प्रो. संजीव सिंह सहित अनेकों डीन, डायरेक्टर, अधिकारी, शिक्षक एवं विद्यार्थी उपस्थित रहे।


Anoop Lather
Consultant
Media Relations/ PRO
University of Delhi

