2025 में भारत की बिजली कहानी में एक ऐसा मोड़ आया है, जिसे सिर्फ आंकड़ों से नहीं, दिशा से समझना होगा।
वैश्विक ऊर्जा थिंक टैंक Ember की नई रिपोर्ट Global Electricity Review 2026 के मुताबिक, भारत में 2025 के दौरान नवीकरणीय ऊर्जा उत्पादन में रिकॉर्ड बढ़ोतरी हुई। सोलर, पवन, हाइड्रो और बायोएनर्जी मिलाकर कुल 98 टेरावॉट-घंटे की बढ़ोतरी, यानी करीब 24 प्रतिशत का उछाल।
यह सिर्फ एक बड़ा नंबर नहीं है। यह उस बदलाव का संकेत है, जहां पहली बार साफ ऊर्जा की रफ्तार बिजली की मांग से भी आगे निकल गई।
2025 में बिजली की मांग 49 टेरावॉट-घंटे बढ़ी। लेकिन नवीकरणीय ऊर्जा उससे दोगुनी रफ्तार से बढ़ी। नतीजा, जीवाश्म ईंधन से बनने वाली बिजली में गिरावट।
करीब 3.3 प्रतिशत की कमी, यानी 52 टेरावॉट-घंटे कम उत्पादन। साल 2000 के बाद यह सिर्फ तीसरी बार हुआ है, जब भारत में फॉसिल पावर घटी है।
यह कहानी सिर्फ भारत तक सीमित नहीं रही। चीन में भी फॉसिल पावर में गिरावट आई, और दोनों देशों के इस बदलाव ने वैश्विक स्तर पर भी असर डाला, जहां कुल फॉसिल पावर उत्पादन में हल्की गिरावट दर्ज हुई।
लेकिन इस बदलाव का सबसे मजबूत चेहरा सोलर बनकर उभरा।
2025 में भारत ने सोलर बिजली उत्पादन में 53 टेरावॉट-घंटे की बढ़ोतरी की। 37 प्रतिशत की ग्रोथ, जो वैश्विक औसत से ज्यादा है। इतना ही नहीं, भारत ने 38 गीगावॉट की नई सोलर क्षमता जोड़ी, जो पहली बार अमेरिका से भी ज्यादा रही।
इसका असर साफ दिखा। सोलर ने अकेले ही देश की बढ़ती बिजली मांग को पूरा कर दिया।
और एक और अहम बदलाव हुआ। सोलर ने हाइड्रो को पीछे छोड़ते हुए भारत का सबसे बड़ा क्लीन पावर स्रोत बनने का दर्जा हासिल कर लिया। 2022 में जहां सोलर उत्पादन 96 टेरावॉट-घंटे था, वहीं 2025 में यह बढ़कर 196 टेरावॉट-घंटे पहुंच गया।
Aditya Lolla कहते हैं, “भारत के पावर सिस्टम में बदलाव का सबसे बड़ा ड्राइवर अब सोलर बन चुका है। बैटरी स्टोरेज के साथ मिलकर यह 24 घंटे सस्ती और साफ बिजली का रास्ता खोल रहा है, जो ऊर्जा सुरक्षा को भी मजबूत करेगा।”
पवन ऊर्जा की कहानी भी पीछे नहीं है।
2025 में पवन ऊर्जा उत्पादन में 22 टेरावॉट-घंटे की बढ़ोतरी हुई, जो अब तक की सबसे बड़ी सालाना बढ़ोतरी है। पिछले दस साल में पवन ऊर्जा तीन गुना बढ़ चुकी है। भारत अब दुनिया का पांचवां सबसे बड़ा पवन ऊर्जा उत्पादक बन गया है।
Duttatreya Das कहते हैं, “भारत का पावर सेक्टर एक नए चरण में प्रवेश कर रहा है। लेकिन आगे की राह के लिए ग्रिड इंफ्रास्ट्रक्चर और स्टोरेज में निवेश बहुत जरूरी होगा, ताकि इस सस्ती क्लीन पावर का बेहतर इस्तेमाल हो सके।”
फिर भी तस्वीर पूरी तरह एकतरफा नहीं है।
भारत अभी भी दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा कोयला आधारित बिजली उत्पादक है। और कुल बिजली उत्पादन में सोलर और पवन की हिस्सेदारी अभी 14 प्रतिशत है, जो वैश्विक औसत 17 प्रतिशत से कम है।
यानी बदलाव शुरू हो चुका है, लेकिन सफर अभी बाकी है।
फिर भी, इस पूरे बदलाव में एक अहम संकेत छुपा है।
यह सिर्फ ऊर्जा का ट्रांजिशन नहीं है। यह जोखिम कम करने की कहानी भी है।
जब सोलर और पवन जैसी घरेलू, कम लागत वाली ऊर्जा तेजी से बढ़ती है, तो देश की निर्भरता आयातित ईंधन पर कम होती है। वैश्विक संकटों, तेल और गैस की कीमतों के उतार-चढ़ाव से सुरक्षा मिलती है।
और शायद यही इस पूरी कहानी का असली मतलब है।
भारत की बिजली अब सिर्फ कोयले पर नहीं टिक रही है। वह धीरे-धीरे धूप और हवा की तरफ मुड़ रही है।
यह बदलाव शोर मचाकर नहीं आया।
यह चुपचाप आया है, आंकड़ों के बीच।
लेकिन इसका असर दूर तक जाएगा।
डॉ. सीमा जावेद
पर्यावरणविद & कम्युनिकेशन विशेषज्ञ

