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नारी की पीड़ा – डॉ.राजीव डोगरा

आखिर मैं ही क्योंदबी कुचली रहुँ इस समाज मेंक्या मेरा कोई अस्तित्व नहीं ? आखिर मैं ही क्योंअपनी पीड़ा को अंतर मन में रखूँक्या मेरी संवेदनाओ का कोई वजूद नहीं?…

कविता – कुछ सिखा है

टूटे हुए लफ्ज़ों को बटोर कर मैंना लिखना सिखा हैं। बहतें अश्कों के दरिया में डूबकर मैंना तैरना सिखा है। जिस मिट्टी में मेरे अपनों ने ही मुझे मिट्टी किया,…