भारत इस समय दुनिया के सबसे बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर और मैन्युफैक्चरिंग विस्तारों में से एक के बीच खड़ा है।
नई फैक्ट्रियां बन रही हैं। रेलवे नेटवर्क फैल रहा है। शहर ऊंचे हो रहे हैं। और इस पूरी कहानी की रीढ़ है स्टील।
लेकिन इसी स्टील के भीतर एक ऐसा सवाल छिपा है, जो आने वाले दशकों में भारत की अर्थव्यवस्था, ऊर्जा सुरक्षा और जलवायु नीति, तीनों को प्रभावित कर सकता है।
अगर भारत ने आने वाले वर्षों में स्टील उत्पादन बढ़ाने के लिए पुराने कोयला आधारित मॉडल पर भरोसा जारी रखा, तो देश अगले 40 साल में करीब 1 ट्रिलियन डॉलर के coking coal आयात के बोझ में फंस सकता है।
यह दावा India Energy and Climate Center (IECC) की नई स्टडी में किया गया है। यह केंद्र के Goldman School of Public Policy के तहत काम करता है।
रिपोर्ट के मुताबिक भारत अगले दशक में अपनी स्टील उत्पादन क्षमता लगभग दोगुनी करने की ओर बढ़ रहा है। लेकिन अगर यह विस्तार पारंपरिक blast furnace मॉडल के जरिए होता है, तो देश लगभग 6 अरब टन coking coal के आयात पर निर्भर हो सकता है।
यहीं से “ग्रीन स्टील” की चर्चा शुरू होती है।
ग्रीन स्टील यानी ऐसा स्टील, जिसमें कोयले की जगह ग्रीन हाइड्रोजन का इस्तेमाल हो।
मतलब स्टील उत्पादन का ईंधन fossil fuel नहीं, renewable energy बने।
Neelima Jain, जो India Energy and Climate Center में Director for Industrial and Trade Policy हैं, ने कहा कि भारत इस समय स्टील सेक्टर में एक “strategic decision point” पर खड़ा है।
उनके मुताबिक,
“अगर भविष्य की स्टील क्षमता imported coking coal पर आधारित हुई, तो भारत अपने सबसे महत्वपूर्ण औद्योगिक सेक्टर में currency volatility और price shocks का जोखिम स्थायी रूप से जोड़ देगा। ग्रीन स्टील एक वैकल्पिक रास्ता देता है।”
रिपोर्ट कहती है कि भारत के पास low-cost renewable energy का बड़ा आधार है। यही चीज़ भारत को घरेलू स्तर पर सस्ता green hydrogen बनाने में मदद कर सकती है।
स्टडी के अनुसार 2030 तक भारत में green hydrogen की लागत लगभग 3 डॉलर प्रति किलोग्राम तक आ सकती है। इससे green steel उत्पादन की लागत लगभग 562 डॉलर प्रति टन रहने का अनुमान है, जो नई conventional steel plants की लागत से सिर्फ 5 से 10 प्रतिशत ज्यादा होगी।
लेकिन असली फर्क सिर्फ लागत में नहीं, जोखिम में है।
Jose Dominguez, जो IECC में Research Manager हैं, ने कहा कि conventional steel imported coking coal पर निर्भर रहता है, जिसकी कीमत डॉलर में तय होती है। जबकि green steel को घरेलू renewable electricity और लंबे समय के rupee-denominated contracts के जरिए चलाया जा सकता है।
उन्होंने कहा,
“Static cost comparison पूरी आर्थिक तस्वीर नहीं दिखाता। समय के साथ green steel ज्यादा resilient साबित हो सकता है।”
रिपोर्ट एक और महत्वपूर्ण चेतावनी देती है।
दुनिया के कई बड़े बाजार अब carbon-intensive products पर सख्ती बढ़ा रहे हैं। यूरोपीय संघ का Carbon Border Adjustment Mechanism यानी CBAM पहले ही steel sector को कवर कर चुका है। ऐसे में ज्यादा कार्बन उत्सर्जन वाला भारतीय स्टील भविष्य में export liability बन सकता है।
IECC में Co-Faculty Director, Nikit Abhyankar, का कहना है कि भारत दुनिया के उन चुनिंदा देशों में हो सकता है जहां इस दशक के भीतर green steel आर्थिक रूप से व्यवहारिक बन जाए।
उन्होंने कहा,
“भारत में green hydrogen की लागत दुनिया में सबसे कम है। इससे भारतीय उत्पादकों को export markets में बढ़त मिल सकती है। साथ ही automobile और machinery जैसे downstream sectors की competitiveness भी मजबूत हो सकती है।”
हालांकि रिपोर्ट यह भी साफ करती है कि सिर्फ लंबे समय की आर्थिक संभावना काफी नहीं होगी।
ग्रीन स्टील को शुरुआती दौर में policy support, financing frameworks और market creation mechanisms की जरूरत पड़ेगी। इसमें long-term offtake agreements, emission verification standards, reliable clean power access और शुरुआती प्रोजेक्ट्स के लिए risk-sharing models शामिल हैं।
Amol Phadke, जो IECC में Faculty Director हैं, ने कहा कि भारत पहले renewable energy और energy storage sectors में दिखा चुका है कि सही public policy कैसे private investment और technology deployment को तेज कर सकती है।
उनके मुताबिक,
“Green steel को भी वैसी ही deliberate market-creation effort की जरूरत होगी।”
भारत की जलवायु कहानी अक्सर बिजली, EVs और solar panels के इर्द-गिर्द घूमती है।
लेकिन आने वाले वर्षों में असली लड़ाई शायद उन industries में होगी, जिन पर आधुनिक अर्थव्यवस्था खड़ी है।
स्टील उनमें सबसे ऊपर है।
क्योंकि सवाल सिर्फ यह नहीं कि भारत कितना स्टील बनाएगा।
सवाल यह भी है कि वह किस कीमत पर, किस ईंधन से, और किस भविष्य के लिए बनेगा।
डॉ. सीमा जावेद
पर्यावरणविद & कम्युनिकेशन विशेषज्ञ

