अभिव्यक्ति की आजादी को लेकर हुआ था संविधान का पहला संशोधन: प्रफुल्ल केतकर

नई दिल्ली, 25 मई। अम्बेडकर विश्वविद्यालय, दिल्ली की कुलपति प्रो. अनु सिंह लाठर ने कहा कि बाबा साहेब भीम राव अम्बेडकर को सच्ची श्रद्धांजलि देने का सबसे बड़ा तरीका यह है कि उनकी जो सोच रही है, उसको आप अपने रोजमर्रा के जीवन में उतारें। प्रो. लाठर दिल्ली विश्वविद्यालय के राजनीति विज्ञान विभाग, उत्तरी परिसर में “Constitutionalism, Equality, and Ambedkar’s Legacy” विषय पर आयोजित एक चर्चा की अध्यक्षता करते हुए बतौर मुख्य अतिथि संबोधित कर रही थी। उन्होंने कहा कि बाबा साहब की विचारधारा को समझने और आगे बढ़ाने में ऐसे आयोजन, सेमिनार और कॉन्फ्रेंस बहुत लाभकारी हैं।

प्रो. अनु लाठर ने अपने संबोधन में कहा कि उस दौर में हमारे देश के बहुत से नेता ऑक्सफोर्ड और कैम्ब्रिज आदि जैसे विदेशी विश्वविद्यालयों में पढ़ें, लेकिन बाबा साहब का कोई मुक़ाबला नहीं है। बाबा साहब ने अपनी शिक्षा को मूवमेंट में बदला। उन्होंने लोजिकल लर्नर्स की एक मूवमेंट खड़ी की। प्रो. लाठर ने कहा कि मैं बाबा साहब के साथ एक रिसर्चर और यूनिवर्सिटी प्रोफेसर के तौर पर कनैक्ट करती हूँ तो मुझे लगता है कि अगर वो किसी यूनिवर्सिटी में इकोनॉमिक्स के प्रोफेसर होते तो वह और भी अधिक योगदान दे सकते थे। उन्होंने बताया कि अम्बेडकर विश्वविद्यालय (एयूडी) में 56 कोर्स बाबा साहेब पर चल रहे हैं। एयूडी में प्रतिवर्ष 14 अप्रैल को बाबा साहब का जयंती समारोह आयोजित किया जाता है जो निरंतर सात दिनों तक चलता है। इस दौरान सभी प्रोग्राम बाबा साहेब भीम राव अम्बेडकर आधारित पर ही होते हैं।  

इस अवसर पर मुख्य वक्ता के तौर पर ऑर्गनाइज़र साप्ताहिक के संपादक, प्रफुल्ल केतकर ने संबोधित किया। उन्होंने अपने संबोधन में कहा कि संविधान का पहला संशोधन अभिव्यक्ति की आजादी को लेकर था। उन्होंने कहा कि अम्बेडकर चाहते थे कि अभिव्यक्ति की आजादी पर प्रतिबंध कम से कम हों। उन्होंने त्रिपुरदमन सिंह की पुस्तक ‘सिक्सटीन स्टॉर्मी डेज़’ का हवाला देते हुए कहा कि 1951 में भारत के पहले चुनाव से पूर्व पहले संविधान संशोधन को लेकर सदन के भीतर और बाहर बहुत सी बहसें होती थी। सदन के बाहर भी बहुत कुछ घट रहा था जो अंदर सदन में पहुँचकर उसे प्रभावित कर रहा था। छात्रों को ये बहसों को पढ़ना चाहिए। उन्होंने संविधान निर्माण में बाबा साहेब अम्बेडकर के योगदान और उस दौरान कई मामलों में जवारलाल नेहरू के साथ हुए वैचारिक मतभेदों को विस्तार से बताया। प्रफुल्ल केतकर ने कहा कि आज हम जब सीएए पर बात करते हैं तो उसकी जड़ें नेहरू-लियाकत समझौते से जुड़ी हैं।  

कार्यक्रम के आरंभ में राजनीति विज्ञान विभाग की विभागाध्यक्ष प्रो. रेखा सक्सेना ने स्वागत भाषण किया। इस अवसर पर बतौर विशिष्ट अतिथि राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग (भारत सरकार) के सदस्य डॉ. पार्थ बिस्वास उपस्थित रहे। उनके साथ सफदरजंग अस्पताल के वरिष्ठ चिकित्सक डॉ. अश्विनी कुमार तथा समाजसेवी एवं दिल्ली उच्च न्यायालय के अधिवक्ता प्रशांत कुमार बतौर विशेष आमंत्रित अतिथि उपस्थित रहे। —

Anoop Lather

Consultant

Media Relations/ PRO

University of Delhi

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *