नई दिल्ली। रामजस कॉलेज, दिल्ली विश्वविद्यालय की एक परीक्षा चल रही थी। कक्षा में एक दृष्टिबाधित प्राध्यापक शांत भाव से परीक्षा की निगरानी कर रहे थे। कुछ छात्रों ने यह मान लिया कि उन्हें कुछ दिखाई नहीं देता, इसलिए धीरे-धीरे फुसफुसाहटें शुरू हो गईं, मोबाइल फोन मेज़ों के नीचे निकल आए और नकल का सिलसिला चल पड़ा।

इसी बीच किसी छात्र ने धीमी आवाज़ में कहा – “अगर इन्हें दिखाई नहीं देता, तो ये यहाँ क्यों हैं?”
शायद यह वाक्य उस समय अधिकांश लोगों के लिए एक सामान्य टिप्पणी रहा होगा, लेकिन कुछ छात्रों के लिए यही प्रश्न आत्ममंथन का कारण बन गया । उन्होंने महसूस किया कि किसी व्यक्ति की वर्षों की मेहनत, योग्यता और अनुभव को उसकी एक शारीरिक चुनौती तक सीमित कर देना केवल असंवेदनशीलता नहीं, बल्कि समाज की सोच का प्रतिबिंब है । यहीं से जन्म हुआ ‘प्रोजेक्ट अनुभव’ (Project Anubhava) का — एक ऐसी पहल, जिसका उद्देश्य केवल जागरूकता फैलाना नहीं, बल्कि लोगों को न्यूरोडाइवर्सिटी को महसूस कराना है।

जानकारी बढ़ी, लेकिन समझ अभी भी अधूरी

पिछले कुछ वर्षों में भारत में ऑटिज़्म, एडीएचडी (ADHD), डिस्लेक्सिया और न्यूरोडाइवर्सिटी जैसे विषयों पर पहले की तुलना में अधिक चर्चा होने लगी है। स्कूलों में जागरूकता अभियान चलाए जाते हैं, सोशल मीडिया और इंटरनेट पर अनेक लेख उपलब्ध हैं और संस्थान समावेशिता ( Inclusion) की बात भी करते हैं।


लेकिन वास्तविक जीवन में स्थिति अक्सर अलग दिखाई देती है।
जो बच्चा कक्षा में अधिक सक्रिय रहता है, उसे अनुशासनहीन कह दिया जाता है। डिस्लेक्सिया से जूझ रहे छात्र की क्षमता पर सवाल उठाए जाते हैं। ऑटिज़्म से जुड़े लोगों को उनके व्यवहार के आधार पर “अलग” या “असामान्य” मान लिया जाता है। समस्या जानकारी की कमी से अधिक, संवेदनशील समझ के अभाव की है।
प्रोजेक्ट के दौरान किए गए अध्ययन में यह भी सामने आया कि मुख्यधारा के अनेक विद्यालयों में शिक्षकों और विशेषज्ञों के पास न्यूरोडाइवर्जेंट बच्चों के साथ काम करने का पर्याप्त प्रशिक्षण नहीं है। परिणामस्वरूप, कई बार उनके व्यवहार को समझने के बजाय उन्हें केवल अनुशासन के दायरे में देखने की कोशिश की जाती है।

‘अनुभव’ – जहाँ सहानुभूति केवल शब्द नहीं रहती

एनैक्टस रामजस (Enactus Ramjas) के छात्रों द्वारा शुरू किया गया प्रोजेक्ट अनुभव इसी सोच को बदलने का प्रयास है। संस्कृत का शब्द अनुभव स्वयं इस पहल के उद्देश्य को स्पष्ट करता है— दूसरों के जीवन को केवल समझना नहीं, बल्कि उसकी झलक महसूस करना ।
टीम का मानना है कि कोई व्यक्ति ऑटिज़्म या एडीएचडी के बारे में पढ़ सकता है, लेकिन जब तक वह उन चुनौतियों की एक छोटी-सी झलक स्वयं अनुभव नहीं करेगा, तब तक वास्तविक संवेदनशीलता विकसित होना कठिन है।

इसी विचार के आधार पर इस परियोजना ने केवल व्याख्यानों और पोस्टरों तक सीमित रहने के बजाय एक इंटरैक्टिव सिमुलेशन मॉडल विकसित किया है।

जब अदृश्य चुनौतियाँ अनुभव का हिस्सा बनती हैं

परियोजना के अंतर्गत ऑटिज़्म से जुड़े बच्चों के साथ मिलकर सोशल और इमोशनल स्क्रिप्ट कार्ड्स तैयार किए गए हैं। रंगों और दृश्य संकेतों की सहायता से ये कार्ड बच्चों को विभिन्न सामाजिक परिस्थितियों और भावनाओं को समझने में मदद करते हैं।
इसके अतिरिक्त, परियोजना का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा एक एम्पैथी सिमुलेशन है। इसमें प्रतिभागियों को ऐसे छोटे-छोटे कार्य दिए जाते हैं जो न्यूरोडाइवर्जेंट व्यक्तियों की दैनिक चुनौतियों की एक झलक प्रस्तुत करते हैं।
कहीं उलझे हुए अक्षरों को पढ़ने का प्रयास कराया जाता है ताकि डिस्लेक्सिया से जुड़ी कठिनाइयों का आभा हो सके, तो कहीं लगातार शोर और अनेक उत्तेजनाओं के बीच ध्यान केंद्रित करने की स्थिति बनाई जाती है, जिससे एडीएचडी या सेंसरी प्रोसेसिंग संबंधी चुनौतियों को बेहतर ढंग से समझा जा सके।
परियोजना का उद्देश्य किसी स्थिति की पूर्ण नकल करना नहीं है, बल्कि लोगों को यह महसूस कराना है कि जिन परिस्थितियों को वे सामान्य मानते हैं, वे किसी और के लिए कितनी कठिन हो सकती हैं।


सिर्फ एक कॉलेज प्रोजेक्ट नहीं, सामाजिक बदलाव की दिशा में कदम


एनैक्ट्स रामजस इससे पहले भी पर्यावरण और सामुदायिक विकास से जुड़े कई प्रोजेक्ट्स पर कार्य कर चुका है। कृषि अपशिष्ट से जैव-अवक्रमणीय कटलरी, जलकुंभी (Water Hyacinth) से टिकाऊ उत्पाद, कम्पोस्ट प्रबंधन तथा हस्तशिल्प जैसे प्रयास इसकी पहचान रहे हैं।
प्रोजेक्ट अनुभव इस यात्रा का एक नया अध्याय है, जहाँ केंद्र में पर्यावरण नहीं, बल्कि मानवीय संवेदनाएँ हैं।
टीम वर्तमान में शिक्षकों, गैर-सरकारी संगठनों (NGOs ) और विभिन्न संस्थानों के साथ मिलकर इस मॉडल का परीक्षण और परिष्कार कर रही है। दिल्ली विश्वविद्यालय के सामाजिक कार्य विभाग का भी इसमें सहयोग प्राप्त हो रहा है। भविष्य में इस पहल के अंतर्गत वर्चुअल रियलिटी (VR) आधारित अनुभव, शिक्षकों एवं अभिभावकों के लिए प्रशिक्षण कार्यक्रम तथा विद्यालयों और कॉर्पोरेट संस्थानों में संवेदनशीलता कार्यशालाएँ आयोजित करने की योजना है।

समावेशन की नई परिभाषा

समावेशन केवल नीतियों या नियमों से नहीं आता। वास्तविक समावेशन तब संभव होता है जब समाज किसी व्यक्ति की भिन्नता को स्वीकार करने के साथ-साथ उसे समझने का भी प्रयास करे।
प्रोजेक्ट अनुभव हमें यही संदेश देता है कि न्यूरोडाइवर्जेंट लोगों को दुनिया के अनुरूप बदलने की अपेक्षा करने के बजाय, हमें अपनी सोच और व्यवस्था को अधिक मानवीय बनाना होगा।
जब जानकारी संवेदनशील अनुभव में बदलती है, तभी समाज वास्तव में समावेशी बनता है। शायद यही इस पहल की सबसे बड़ी उपलब्धि है— लोगों को यह सिखाना कि किसी व्यक्ति की सबसे बड़ी पहचान उसकी सीमाएँ नहीं, बल्कि उसकी संभावनाएँ होती हैं।

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