भारत के माननीय उपराष्ट्रपति एवं दिल्ली विश्वविद्यालय के कुलाधिपति श्री सी.पी. राधाकृष्णन ने कहा कि महान विश्वविद्यालय सिर्फ़ इंफ्रास्ट्रक्चर से नहीं, बल्कि चरित्र निर्माण और विद्यार्थियों में डाले जाने वाले मूल्यों से पहचाने जाते हैं। उपराष्ट्रपति दिल्ली विश्वविद्यालय के 102 वें दीक्षांत समारोह में बतौर मुख्य अतिथि संबोधित कर रहे थे। इस अवसर पर उन्होंने बटन दबा कर 120408 विद्यार्थियों की डिजिटल डिग्रियाँ भी जारी की। इसके साथ ही मुख्य अतिथि ने 10 प्रतिभाशाली विद्यार्थियों को अपने हाथों से मेडल भी प्रदान किए। इस अवसर पर बुक ऑफ हाइलाइट्स नामक पुस्तक भी जारी की गई। विश्वविद्यालय के बहुउद्देशीय खेल परिसर में आयोजित इस दीक्षांत समारोह की अध्यक्षता करते हुए दिल्ली विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. योगेश सिंह ने की। कुलपति ने विद्यार्थियों को संबोधित करते हुए कहा कि यह देश हमारा है और इसकी चिंता भी हमें ही करनी होगी।

उपराष्ट्रपति ने अपने दीक्षांत भाषण में इस समारोह की अहमियत बताते हुए कहा कि दीक्षांत अंत नहीं बल्कि एक शुरुआत है। यह ज़िंदगी के एक फेज़ के पूरा होने और दूसरे फेज़ की शुरुआत, दोनों को दिखाता है। उन्होंने विश्वविद्यालय की सौ साल पुरानी अकादमिक विरासत की तारीफ की और इसे भारत के उच्च शिक्षण संस्थानों में सबसे खास स्थान बताया। विकसित भारत 2047 के विज़न का ज़िक्र करते हुए, उन्होंने कहा कि ये ग्रेजुएट देश के भविष्य के आर्किटेक्ट के तौर पर काम करेंगे और भारत के डेवलपमेंट को आकार देने में अहम भूमिका निभाएंगे।

श्री सी.पी. राधाकृष्णन ने कहा कि 1922 में मात्र तीन महाविद्यालयों के साथ अपनी यात्रा प्रारंभ करने वाला दिल्ली विश्वविद्यालय आज 90 से अधिक महाविद्यालयों, अनेक संकायों और हजारों शिक्षकों-शोधार्थियों के साथ वैश्विक स्तर पर अपनी मजबूत पहचान स्थापित कर चुका है। विश्वविद्यालय की निरंतर बेहतर होती राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय रैंकिंग इसकी शैक्षणिक उत्कृष्टता का प्रमाण है। उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि आने वाले वर्षों में दिल्ली विश्वविद्यालय वैश्विक रैंकिंग में और ऊँचा स्थान प्राप्त करते हुए विश्व के अग्रणी विश्वविद्यालयों में शामिल होगा। उन्होंने कहा कि डिग्रियां तो सिर्फ सर्टिफिकेट हैं, लेकिन सच्ची शिक्षा तो इंसानियत, चरित्र और जिम्मेदारी से झलकती है। विद्यार्थियों को संबोधित करते हुए उप राष्ट्रपति ने कहा कि शिक्षा जीवन का अंतिम पड़ाव नहीं बल्कि निरंतर चलने वाली प्रक्रिया है। उन्होंने जोर देते हुए कहा कि ज्ञान अर्जन एक सतत प्रक्रिया है और कोई भी शक्ति उच्च शिक्षा की प्रगति को रोक नहीं सकती।

उन्होंने आत्मनिर्भर भारत और विकसित भारत–2047 के लक्ष्य का उल्लेख करते हुए कहा कि भारत अपनी स्वतंत्रता के 100 वर्ष पूर्ण होने पर एक विकसित राष्ट्र के रूप में उभरेगा, और इस लक्ष्य की प्राप्ति में आज के युवा स्नातकों की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण होगी। उन्होंने भारतीय ज्ञान परंपरा, पारदर्शी समाज, अनुशासन तथा नैतिक मूल्यों को राष्ट्र निर्माण की आधारशिला बताया। अपने संबोधन में उन्होंने जम्मू-कश्मीर सहित देश के दूरस्थ क्षेत्रों के विद्यार्थियों की प्रगति का उल्लेख करते हुए कहा कि आज देश के प्रत्येक हिस्से के युवा शिक्षा के माध्यम से नई ऊंचाइयों को प्राप्त कर रहे हैं, जो भारत के उज्ज्वल भविष्य का संकेत है। अपने संबोधन के समापन में उन्होंने सभी स्नातकों को शुभकामनाएं देते हुए कहा कि आज प्राप्त डिग्रियां केवल उपलब्धि नहीं, बल्कि समाज और राष्ट्र के प्रति उत्तरदायित्व निभाने की नई शुरुआत हैं। उन्होंने विद्यार्थियों से ज्ञान, संवेदनशीलता और सेवा भाव के साथ राष्ट्र निर्माण में योगदान देने का आह्वान किया।

समारोह की अध्यक्षता करते हुए डीयू कुलपति प्रो. योगेश सिंह ने कहा कि दिल्ली विश्वविद्यालय ने द्वितीय विश्व युद्ध और कोविड-19 महामारी जैसी चुनौतियों के बावजूद अपनी शैक्षणिक परंपरा को बनाए रखते हुए प्रत्येक वर्ष दीक्षांत समारोह का आयोजन किया है, जो विश्वविद्यालय की अकादमिक प्रतिबद्धता का प्रतीक है। उन्होंने उपराष्ट्रपति का स्वागत करते हुए उन्हें विनम्र, शांत एवं बौद्धिक व्यक्तित्व का धनी बताते हुए भारतीय मूल्यों और तमिल सांस्कृतिक परंपरा का सशक्त प्रतिनिधि बताया। कुलपति ने विश्वविद्यालय की उपलब्धियों का उल्लेख किया। विश्वविद्यालय की उपलब्धियों में बेटियों के अधिक योगदान का जिक्र करते हुए कुलपति ने कहा कि “हमारी बेटियाँ राष्ट्र की शक्ति और गौरव हैं।”

कुलपति ने विद्यार्थियों को समाज, राष्ट्र और मानवता के प्रति उत्तरदायित्व निभाने का आह्वान करते हुए दिल्ली विश्वविद्यालय के ध्येय वाक्य “निष्ठा धृति: सत्यम्” और राष्ट्र प्रथम को जीवन का मार्गदर्शक सिद्धांत बनाने का संदेश दिया। प्रो. योगेश सिंह ने कहा कि देश की प्रगति और सामाजिक समरसता की जिम्मेदारी स्वयं नागरिकों की होती है। उन्होंने कहा, “यह देश हमारा है और इसकी चिंता भी हमें ही करनी होगी। हमें ऐसा कोई कार्य नहीं करना चाहिए जिससे समाज के भाईचारे, सौहार्द और राष्ट्रीय एकता को क्षति पहुँचे।” उन्होंने विद्यार्थियों से राष्ट्र निर्माण में सकारात्मक भूमिका निभाने और सामाजिक जिम्मेदारी के साथ आगे बढ़ने का आह्वान किया। अपने प्रेरणादायी संदेश में उन्होंने जीवन मूल्यों पर बल देते हुए कहा कि जीवन की वास्तविक खुशी व्यक्तिगत उपलब्धियों में नहीं, बल्कि उन लोगों की मुस्कान में निहित होती है जो हमारे कार्यों और व्यवहार से प्रसन्न होते हैं। उन्होंने कहा कि संबंधों की संवेदनशीलता और मानवीय जुड़ाव ही समाज को मजबूत बनाते हैं तथा यही जीवन की सच्ची सफलता का आधार है।

समारोह के दूसरे चरण में मेडल और पुरस्कार प्राप्त करने वाले बाकी सभी विद्यार्थियों को डीयू कुलपति प्रो. योगेश सिंह द्वारा मेडल/ पुरस्कार प्रदान किए गए। इस अवसर पर डीन ऑफ कॉलेजेज़ प्रो. बलराम पाणी, दक्षिणी परिसर की निदेशक प्रो. रजनी अब्बी, एसओएल की निदेशक प्रो. पायल मागो, रजिस्ट्रार डॉ. विकास गुप्ता और परीक्षा नियंत्रक प्रो. गुरप्रीत सिंह टुटेजा सहित सभी डीन, विभागाध्यक्ष, शिक्षक, अधिकारी, कर्मचारी और हजारों विद्यार्थी एवं उनके अभिभावक उपस्थित रहे।  

734 शोधार्थियों को मिली पीएचडी. डिग्री

डीयू के 102 वें दीक्षांत समारोह में कुल 1,20,408 विद्यार्थियों के साथ ही 734 शोधार्थियों को पीएचडी. की डिग्रियां भी प्रदान की गई। दीक्षांत समारोह के दौरान कुल 132 गोल्ड एवं सिल्वर मेडल तथा पुरस्कार प्रदान किए गए। इनमें यूजी और पीजी के विद्यार्थियों को कुल 112 गोल्ड मेडल एवं एक सिल्वर मेडल प्रदान किए गए। इसी तरह यूजी और पीजी के विद्यार्थियों को कुल 19 पुरस्कार (सर्टिफिकेट) प्रदान किए गए। समारोह के दौरान डीयू के रेगुलर विद्यार्थियों, एनसीडबल्यूईबी और एसओएल के विद्यार्थियों को मिलाकर कुल 109003 यूजी, 11362 पीजी और 43 एफ़वाईयूपी प्रोग्रामों के विद्यार्थियों को भी डिग्रियां प्रदान की गई। इस दौरान शताब्दी चांस के तहत अपनी डिग्री पूर्ण करने वाले 20 विद्यार्थियों को भी डिग्रियां प्रदान की गई।

Anoop Lather

Consultant

Media Relations/ PRO

University of Delhi

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