फिर वही मौसम बुलाए, फिर वही शामें मिलें,
तेरी बातों की महक से, ये हवाएँ फिर खिलें।
खामोश बैठे देखते रहें, चाँदनी के सिलसिले,
दिल के इन रास्तों पर, तेरे कदमों के काफ़िले।
धूप की नरम उँगलियाँ जब छू लें आँगन की ज़मीं,
याद की चादर बिछाकर सोएँ कुछ पल हम यहीं।
तेरी हँसी के झरनों में भीगते रहें बेख़बर,
वक़्त ठहर जाए वहीं पर, थाम कर मेरा सफ़र।
फिर वही मौसम बुलाए, फिर वही शामें मिलें,
तेरी बातों की महक से, ये हवाएँ फिर खिलें।
खामोश बैठे देखते रहें, चाँदनी के सिलसिले,
दिल के इन रास्तों पर, तेरे कदमों के काफ़िले।
सर्द पहरों की ख़ामोशी ओढ़कर बैठें कहीं,
दूर पर्वत की चोटियों पर लिख दें अपनी ज़िंदगी।
बर्फ़ बनकर गिर रहे हों ख़्वाब आँखों के सभी,
तू अगर साथ हो तो फिर क्या कमी, कैसी कमी।
फिर वही मौसम बुलाए, फिर वही शामें मिलें,
तेरी बातों की महक से, ये हवाएँ फिर खिलें।
खामोश बैठे देखते रहें, चाँदनी के सिलसिले,
दिल के इन रास्तों पर, तेरे कदमों के काफ़िले।
रात के गहरे समंदर में चाँद तेरा नाम ले,
तारों की महफ़िल सजे तो दिल तेरा पैग़ाम दे।
उम्र की इस दौड़ से कुछ दूर चलें हम-तुम कहीं,
जहाँ बस प्यार बोलता हो, और कोई बात नहीं।
फिर वही लम्हे सजाएँ, फिर वही सपने बुनें,
हाथ में हो हाथ तेरा, और सदी भर यूँ चलें।
खामोश बैठे देखते रहें, चाँदनी के सिलसिले,
दिल के इन रास्तों पर, तेरे कदमों के काफ़िले।
“राहत टीकमगढ़”

