मैं—मैं में नहीं, मुझसे हूँ।

हिम्मत नहीं है मुझमें

फिर भी कहूँगी।

समझ नहीं है मुझमें

फिर भी लिखूँगी।

अक्सर लोग निकाल देते हैं

मेरे विचार को दिमाग से

क्योंकि मैं—मैं में नहीं

मुझसे हूँ।

चाहती तो हूँ

दुनिया से दूर रहना

फिर सोचती हूँ 

मैं ही क्यों?

क्यों कोई और नहीं?

बस ऐसी ही

बेतुकी-भरी ख़्वाहिशों में उलझी रहती हूँ।

फिर मायूस होकर,

गुमसुम-सी,

मैं ख़ुद को ही

अपने में समेट लेती हूँ।

आरुषि 

बारहवीं कक्षा की छात्रा 

राजकीय उत्कृष्ट वरिष्ठ माध्यमिक पाठशाला गाहलियां कांगड़ा हिमाचल प्रदेश

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