अनकहा इज़हार – डॉ.राजीव डोगरा
हां मैं लिखता हूं सिर्फ लिखने के लिए नहीं अपने जज्बातों के इज़हार के लिए भी हां मैं लिखता हूं हर अल्फ़ाज़ में तुमको मगर कहता नहीं कभी अपने लफ्जों…
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हां मैं लिखता हूं सिर्फ लिखने के लिए नहीं अपने जज्बातों के इज़हार के लिए भी हां मैं लिखता हूं हर अल्फ़ाज़ में तुमको मगर कहता नहीं कभी अपने लफ्जों…
शमशान की राख को सीने से लिपटाए फिरता हूँ, महाकाल का भगत हूँ उनका नाम लिए फिरते हूँ, मैं चुपचाप सभी की सुनता हूं किसी को कुछ बोलता नहीं। आदेश…
तेरे दर्द को अल्फ़ाज़ दूंगा मत सोच तू अकेला हैं हर कदम पर तेरा साथ दूंगा। दर्द का समुंदर जो तेरे अंदर नित्य रफ़्ता रफ़्ता बहता है उसको भी एक…
मेरे लफ़्ज़ों की आख़िरी बात तू, मेरी ख़ामोशी का हर राज़ तू, तुझसे ही चलती है ये धड़कन, मेरे होने का एहसास तू तेरे बिना सब फीका सा लगे, जैसे…
मृत्यु तुम करो न भक्षण मेरा मैंने भी देखना है काल बड़ा है या काली। भाग्यविधाता लिखो ना भाग्य मैंने भी देखना है कर्म बड़ा है या कर्मदाता। समय बदलो…