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अस्तित्व विहीन – डॉ.राजीव डोगरा

बड़े-बड़े सिकंदरयहाँ आयेमानते थे खुद कोबड़े बलशाली धुरंधर। फिर भी बचा न सकेअपने अस्तित्व कोसमेट लियामिट्टी ने अपने अंदर। खुद को खुदा जाना थेमगर औरों कोसदा गधा पहचानते थे। खुदा…

तेरी दोस्ती – डॉ.राजीव डोगरा

तेरी दोस्ती ने हमको जीवन जीना सिखा दिया उदास रहता था मेरा चेहरा उसको मुस्कुराना सिखा दिया। न मिली मोहब्बत जीवन में इसका अब कोई गम नहीं रहा तेरी दोस्ती…

आहट – डॉ.राजीव डोगरा

मेरे कदमों की आहट से वर्तमान ठहर जाएगा और भविष्य का चुपके से आगमन होगा। मेरे कदमों की आहट से देवी शक्तियां मोहित होगी और दुष्ट शक्तियों स्थानांतरण करेंगी। मेरे…

शाश्वत प्रेम – डॉ.राजीव डोगरा

तुम वो फूल होजिसको मैं बिना स्पर्श केखिलता हुआऔर महकता हुआदेखना चाहता हूं। तुम मेरी वोअधूरी ख्वाहिश होजिसके पूरे होने काइंतजार मैंने कईयुगों तक किया है। तुम मेरे जीवन कावो…

नारी की पीड़ा – डॉ.राजीव डोगरा

आखिर मैं ही क्योंदबी कुचली रहुँ इस समाज मेंक्या मेरा कोई अस्तित्व नहीं ? आखिर मैं ही क्योंअपनी पीड़ा को अंतर मन में रखूँक्या मेरी संवेदनाओ का कोई वजूद नहीं?…