उत्तर प्रदेश के बांदा में पारा 48 डिग्री तक पहुंच चुका है। दोपहर में सड़कें खाली हैं। हवा चलती भी है तो ऐसे, मानो चेहरे पर हेयर ड्रायर चला दिया गया हो।
मगर इस बार कहानी सिर्फ दिन की गर्मी की नहीं है। असली डर रात में छुपा है। रात, जो कभी राहत हुआ करती थी।
अब कई शहरों में रात का तापमान भी 30 डिग्री के करीब पहुंच रहा है। लोग पसीने में सो रहे हैं। पंखे चल रहे हैं, मगर शरीर ठंडा नहीं हो रहा। सुबह उठने से पहले ही थकान शुरू हो जा रही है।
क्लाइमेट ट्रेंड्स की नई रिपोर्ट “Why India’s heatwaves feel more brutal than before” बताती है कि भारत की गर्मी अब सिर्फ “हॉट” नहीं रही, बल्कि “अनएस्केपेबल” होती जा रही है।
यानी ऐसी गर्मी जिससे निकलने की जगह कम होती जा रही है।
रिपोर्ट के मुताबिक भारत के “कोर हीटवेव ज़ोन”, जिसमें राजस्थान, दिल्ली, उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश, ओडिशा, तेलंगाना और महाराष्ट्र के हिस्से शामिल हैं, वहां हीटवेव की आवृत्ति और अवधि दोनों बढ़ रही हैं। IMD के आंकड़े बताते हैं कि 1961 से अब तक इन इलाकों में हीटवेव की आवृत्ति हर दशक 0.1 दिन बढ़ी है, जबकि इसकी अवधि 0.44 दिन प्रति दशक बढ़ी है।
सुनने में ये आंकड़े छोटे लग सकते हैं। मगर मौसम विज्ञान में दशकों के हिसाब से होने वाले ऐसे बदलाव पूरे समाज का व्यवहार बदल देते हैं। खेती, बिजली की मांग, मजदूरों की क्षमता, अस्पतालों का दबाव,
सब कुछ।
रिपोर्ट कहती है कि भारत की औसत रात की गर्मी भी तेजी से बढ़ रही है। 2010 से 2024 के बीच देश में औसत न्यूनतम तापमान लगभग 0.21 डिग्री प्रति दशक बढ़ा है। 36 में से 35 राज्यों और केंद्रशासित
प्रदेशों में रातें गर्म हो रही हैं।
WHO की गाइडलाइन कहती है कि घर के भीतर तापमान लगातार 24 डिग्री से ऊपर नहीं होना चाहिए, वरना नींद, दिल और शरीर की रिकवरी पर असर पड़ता है। लेकिन भारत के कई हिस्सों में रात का तापमान अब उससे काफी ऊपर जा चुका है।
यही वजह है कि अब लोग सिर्फ दिन में नहीं, रात में भी “हीट स्ट्रेस” झेल रहे हैं।
स्काईमेट वेदर के उपाध्यक्ष महेश पलावत कहते हैं कि अभी देश के ऊपर कोई बड़ा मौसम तंत्र सक्रिय नहीं है। किसी भी मौसम प्रणाली की अनुपस्थिति में, पाकिस्तान के सिंध क्षेत्र और राजस्थान के रेगिस्तान से आने वाली
गर्म उत्तर-पश्चिमी हवाएँ देश के भीतर गहराई तक प्रवेश कर रही हैं। पिछले तीन से चार दिनों से लगातार चल रही इन हवाओं के कारण तापमान बढ़ रहा है, जिसके परिणामस्वरूप लू से लेकर भीषण लू तक की स्थिति बनी हुई है। जब दिन गर्म होते हैं और शाम को मानसून से पहले की कोई गतिविधि नहीं होती है, तो ये उच्च तापमान रात के तापमान में भी वृद्धि का संकेत देते हैं। वर्तमान मौसम की स्थिति को मई के दौरान सामान्य मौसमी पैटर्न माना जाता है, जो ग्रीष्म ऋतु का चरम भी होता है। पश्चिमी विक्षोभ के आने से ही हमें कुछ राहत मिलेगी, जिससे हवा का पैटर्न बदल जाएगा और बहुत जरूरी राहत मिलेगी।
कोर हीटवेव जोन (सीएचजेड) में पंजाब, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, दिल्ली, हरियाणा, राजस्थान, उत्तर प्रदेश, गुजरात, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, बिहार, झारखंड, पश्चिम बंगाल, ओडिशा और तेलंगाना राज्य और महाराष्ट्र-मराठवाड़ा, विदर्भ और मध्य महाराष्ट्र और तटीय आंध्र प्रदेश के मौसम संबंधी उपखंड शामिल हैं।
लेकिन तापमान अकेला कारण नहीं है।
अब हवा में नमी भी बढ़ रही है।
भारत में लू कोई नई बात नहीं है। जो बदल रहा है वह उस जलवायु का परिवेश है जिसमें ये लू चल रही हैं।गर्मी को रोकने वाले शहरों और बढ़ती आर्द्रता से लेकर शुष्क मिट्टी और जलवायु परिवर्तन से प्रेरित ग्लोबल वार्मिंग तक, कई कारक अब मिलकर अत्यधिक गर्मी को पहले से कहीं अधिक घातक और व्यापक बना रहे हैं।
मानव जनित जलवायु परिवर्तन से आधारभूत तापमान बढ़ रहा है, जिसके परिणामस्वरूप लू की शुरुआत अधिक गर्म पृष्ठभूमि से होती है और उसकी तीव्रता और भी अधिक बढ़ जाती है। विश्व मौसम विज्ञान संगठन (डब्ल्यूएमओ) के अनुसार, 2025 वैश्विक स्तर पर अब तक के तीन सबसे गर्म वर्षों में से एक था, जिसमें वैश्विक तापमान औद्योगिक क्रांति से पहले के स्तर से लगभग 1.44 डिग्री सेल्सियस अधिक था। पिछले ग्यारह वर्षों, 2015-2025, में सभी आठ डेटासेट में ग्यारह सबसे गर्म वर्ष हैं।
भारत भर में रात्रि के औसत तापमान में 2010-2024 के दौरान प्रति दशक लगभग 0.21 डिग्री सेल्सियस की अनुमानित वृद्धि देखी गई है। यद्यपि अंतर-वार्षिक परिवर्तनशीलता के कारण यह वृद्धि वर्ष-दर-वर्ष एकसमान नहीं है, फिर भी व्यापक रुझान ऊपर की ओर ही इंगित करता है, विशेष रूप से जब एकल वर्षों के औसत की तुलना में बहु-वर्षीय औसत की तुलना की जाती है। इस अवधि में भारत भर में रात्रि के तापमान के लिए सबसे गर्म वर्षों में निम्नलिखित शामिल हैं:
· 2010: 19.759 डिग्री सेल्सियस
· 2024: 19.718 डिग्री सेल्सियस
· 2016: 19.595 डिग्री सेल्सियस
· 2022: 19.497 डिग्री सेल्सियस
· 2017: 19.453 डिग्री सेल्सियस
डेटा स्रोत: आईएमडी
लेकिन तापमान अकेला कारण नहीं है।अब हवा में नमी भी बढ़ रही है।
रिपोर्ट के अनुसार 2015-2019 के मुकाबले 2020-2024 के बीच भारत की औसत आर्द्रता 67.1 प्रतिशत से बढ़कर 71.2 प्रतिशत हो गई। यानी हवा में पानी ज़्यादा है। तापमान और आर्द्रता को एक साथ ध्यान में रखते हुए, 2020-2024 का समय 2015-2019 की तुलना में अधिक तनावपूर्ण प्रतीत होता है। ऐसे दिनों की संख्या में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है जब गर्मी और आर्द्रता दोनों एक साथ अधिक थीं। 2015-2019 में लगभग 14,086 गर्म और आर्द्र दिन थे, जो 2020 और 2024 के बीच बढ़कर 16,970 दिन हो गए। वार्षिक स्तर पर, 2024 इस 10-वर्षीय अवधि में संयुक्त रूप से सबसे अधिक गर्म-आर्द्र दिनों की संख्या के साथ सामने आता है।
2015-2019 और 2020-2024 के बीच आर्द्रता में सबसे अधिक वृद्धि वाले राज्य निम्नलिखित हैं:
· दिल्ली: +8.0
· चंडीगढ़: +7.7
· हरियाणा: +7.7
· तेलंगाना: +6.8
· उत्तर प्रदेश: +6.5
· महाराष्ट्र: +6.4
· राजस्थान: +6.3
यही नमी शरीर को पसीने के जरिए ठंडा होने से रोकती है। इसलिए कई बार 40 डिग्री की सूखी गर्मी से ज़्यादा खतरनाक 36 डिग्री की उमस भरी गर्मी होती है।
दिल्ली, हरियाणा, उत्तर प्रदेश और राजस्थान जैसे राज्यों में आर्द्रता में तेज बढ़ोतरी दर्ज हुई है। पिछले दशक में देश में “हॉट एंड ह्यूमिड” दिनों की संख्या भी 14,086 से बढ़कर 16,970 हो गई।
यानी अब भारत की गर्मी सिर्फ “सूखी लू” नहीं रही। यह धीरे-धीरे ट्रॉपिकल हीट स्ट्रेस में बदल रही है।
शहर इस संकट को और बढ़ा रहे हैं।

कंक्रीट, डामर, कम पेड़, ट्रैफिक, एसी से निकलती गर्म हवा, ये सब मिलकर शहरों को “हीट ट्रैप” बना रहे हैं। रिपोर्ट बताती है कि भारत के कई शहर आसपास के ग्रामीण इलाकों से 2 से 10 डिग्री तक ज़्यादा गर्म
हो सकते हैं।
इसका मतलब यह है कि गरीब बस्तियों में रहने वाला वह व्यक्ति, जो दिनभर बाहर काम करता है, उसे रात में भी राहत नहीं मिलती। उसका शरीर अगले दिन की गर्मी शुरू होने से पहले रिकवर ही नहीं कर पाता।
क्लाइमेट ट्रेंड्स की संस्थापक आरती खोसला कहती हैं कि भारत की हीटवेव अब सिर्फ तापमान से नहीं बन रही। बढ़ती नमी, गर्म रातें, शहरीकरण और क्लाइमेट चेंज मिलकर इसे ज्यादा लंबा, ज्यादा खतरनाक और ज्यादा थकाने वाला बना रहे हैं।
रिपोर्ट यह भी बताती है कि सूखी मिट्टी और कम बारिश भी हीटवेव को और तीखा बना रहे हैं। जब मिट्टी में नमी नहीं होती तो सूरज की ऊर्जा जमीन को ठंडा करने में नहीं, हवा को और गर्म करने में लगती है।
यानी अब गर्मी सिर्फ मौसम नहीं रही। यह शहरों की डिजाइन, पानी, मिट्टी, जंगल, घरों और आर्थिक असमानता की भी कहानी है।
और शायद इसीलिए इस बार भारत में लोग सिर्फ पूछ नहीं रहे कि “पारा कितना गया?”
लोग पूछ रहे हैं, “रात में भी इतनी गर्मी क्यों है?”
डॉ. सीमा जावेद
पर्यावरणविद & कम्युनिकेशन विशेषज्ञ

