उमेश कुमार सिंह , श्रीमती शांति देवी , राधवेन्द्र सिंह

बलिया जनपद के सिंहपुर स्थित प्राचीन एवं प्रतिष्ठित श्रीशिव शक्ति मंदिर में एक गरिमामय आध्यात्मिक आयोजन के दौरान प्रख्यात लेखक आनन्द सिंह ने अपनी नवीन कृति ‘सुन्दरकाण्ड रहस्य मीमांसा : आध्यात्मिक एवं दार्शनिक विवेचना’ मंदिर को भेंट की। यह पुस्तक आधुनिक वैश्विक कल्याण संस्थान के कार्यकारी अध्यक्ष उमेश कुमार सिंह के माध्यम से मंदिर प्रबंधन समिति की वरिष्ठ सदस्य श्रीमती शांति देवी को औपचारिक रूप से प्रदान की गई।

वर्ष 1958 के आसपास स्वर्गीय टीमल सिंह द्वारा स्थापित यह मंदिर क्षेत्र में आस्था, भक्ति और आध्यात्मिक चेतना का प्रमुख केंद्र रहा है। वर्तमान में मंदिर का संरक्षण एवं सुव्यवस्थित संचालन आधुनिक वैश्विक कल्याण संस्थान द्वारा किया जा रहा है। संस्थान के सतत प्रयासों से मंदिर परिसर में स्वच्छता, अनुशासन और श्रद्धालुओं की सुविधाओं का निरंतर विस्तार हुआ है, जिससे यह स्थल श्रद्धालुओं के लिए और अधिक आकर्षण का केंद्र बनता जा रहा है।

इस अवसर पर मंदिर प्रबंधन समिति के कार्यकारी अध्यक्ष राधवेन्द्र सिंह, श्रीमती शांति देवी, अभिषेक सिंह, आदित्य सिंह, अनुप सिंह (किंटु सिंह), पूजा सिंह और आरुषि सिंह सहित अनेक श्रद्धालु उपस्थित रहे। कार्यक्रम के दौरान उपस्थित लोगों को पुस्तक की प्रतियां भेंट कर आध्यात्मिक ज्ञान के प्रसार का संदेश भी दिया गया।

लेखक आनन्द सिंह की यह कृति भारतीय आध्यात्मिक परंपरा के महत्वपूर्ण ग्रंथ रामचरितमानस के पंचम सोपान ‘सुन्दरकाण्ड’ पर आधारित एक गहन शोधपरक और दार्शनिक व्याख्या प्रस्तुत करती है। यह पुस्तक केवल धार्मिक कथा तक सीमित नहीं है, बल्कि भक्ति, साहस, विवेक और आत्मसमर्पण जैसे मूल्यों को आधुनिक संदर्भों में समझाने का प्रयास करती है। लेखक ने सुन्दरकाण्ड के प्रसंगों को प्रतीकात्मक दृष्टि से विश्लेषित करते हुए उन्हें मानव जीवन के आंतरिक संघर्षों और आत्मिक विकास से जोड़ा है।

पुस्तक में ‘सुन्दर’ शब्द की पुनरावृत्ति, उसके अंक-तत्व और संरचनात्मक विशेषताओं का विश्लेषण करते हुए उसे पूर्णता और आध्यात्मिक संतुलन का प्रतीक बताया गया है। सागर लंघन, लंका प्रवेश, अशोक वाटिका में सीता की खोज और लंका दहन जैसे प्रसंगों को जीवन की चुनौतियों, भौतिक आकर्षण और आत्मिक शांति की खोज के रूप में व्याख्यायित किया गया है। इस प्रकार श्रीहनुमान की यात्रा को आत्मा की विजय और अंतर्मन की साधना के रूप में प्रस्तुत किया गया है।

लेखक ने श्रीहनुमान के चरित्र को केवल पराक्रम का प्रतीक न मानकर एक आदर्श साधक, संत और दार्शनिक व्यक्तित्व के रूप में चित्रित किया है। ‘बिनु सतसंग बिबेक न होई’ जैसे प्रसंगों के माध्यम से उन्होंने ज्ञान-प्राप्ति की प्रक्रिया को सरल और व्यावहारिक रूप में समझाया है। साथ ही, सुन्दरकाण्ड की फलश्रुतियों—सुख, संशय-निवारण और दुःख-नाश—को आधुनिक मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण से जोड़ते हुए यह बताया गया है कि राम-नाम का स्मरण मानसिक संतुलन और आंतरिक शांति का प्रभावी माध्यम हो सकता है।

आनन्द सिंह की भाषा शैली खड़ी बोली हिंदी पर आधारित है, जिसमें संस्कृतनिष्ठ शब्दावली का समृद्ध प्रयोग देखने को मिलता है। आवश्यकतानुसार उर्दू और अंग्रेज़ी शब्दों का संतुलित उपयोग उनकी लेखन शैली को और प्रभावशाली बनाता है। भाव और तर्क का संतुलित समन्वय इस कृति को सामान्य धार्मिक पुस्तकों से अलग एक विशिष्ट पहचान प्रदान करता है। उनकी पूर्व प्रकाशित कृतियाँ—‘प्रवाह’, ‘मानस-गंगा: श्रीहनुमान चालीसा’—भी इसी विचारधारा को आगे बढ़ाती हैं।

पुस्तक का एक महत्वपूर्ण पक्ष इसका वैश्विक दृष्टिकोण भी है। लेखक ने स्पष्ट किया है कि रामचरितमानस का प्रभाव केवल भारत तक सीमित नहीं है, बल्कि फीजी, मॉरीशस और सूरीनाम जैसे देशों में भी यह भारतीय संस्कृति और आध्यात्मिकता का आधार बना हुआ है। इससे यह कृति वैश्विक भारतीय समाज के लिए भी प्रासंगिक सिद्ध होती है।

डायमंड पॉकेट बुक्स द्वारा प्रकाशित इस पुस्तक की मुद्रण गुणवत्ता उत्कृष्ट है और इसकी प्रस्तुति सरल एवं पठनीय है। कार्यक्रम के अंत में उमेश कुमार सिंह ने कहा कि इस प्रकार की कृतियाँ समाज में सकारात्मक ऊर्जा और आध्यात्मिक जागरूकता को बढ़ावा देती हैं। उन्होंने विश्वास जताया कि यह पुस्तक श्रद्धालुओं और शोधार्थियों दोनों के लिए समान रूप से उपयोगी सिद्ध होगी।

यह आयोजन केवल एक पुस्तक भेंट समारोह नहीं, बल्कि भारतीय आध्यात्मिक परंपरा के गहन अर्थों को समाज तक पहुँचाने का एक सार्थक प्रयास भी रहा।  

एवीके न्यूज सर्विस

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