क्लाइमेट  ट्रेंड्स की नई रिपोर्ट के मुताबिक, जलवायु परिवर्तन का असर भारत की अर्थव्यवस्था पर अभी से  दिखने लगा है जलवायु जोखिमों से निपटने की तैयारी में देश के भीतर निवेश करके भविष्य में होने वाले बड़े आर्थिक नुकसान को कम किया जा सकता है। 

तुर्की  के अंताल्या में शहर में अगले माह आयोजित होने वाले जलवायु परिवर्तन महासम्मेलन COP31 से पहले जारी एक नई रिपोर्ट-“  (जलवायु परिवर्तन और भारत की अर्थव्यवस्था: 

विभिन्न क्षेत्रों पर असर और विकास की चुनौतियां), चेतावनी देती है कि तापमान में हर एक डिग्री सेल्सियस की अतिरिक्त बढ़ोतरी से वर्ष 2100 तक भारत की जीडीपी को हर साल लगभग 3 प्रतिशत का नुकसान हो सकता है।

इससे वर्ष 2047 तक 30 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बनने का भारत का लक्ष्य भी खतरे में पड़ सकता है जलवायु परिवर्तन का असर पहले से ही रोजगार, खाद्य व्यवस्था, स्वास्थ्य, उद्योग, ऊर्जा और सरकारी वित्त पर पड़ रहा है भारत में एक अरब से ज्यादा लोग ऐसे जिलों में रहते हैं,जो जलवायु परिवर्तन  के प्रति संवेदनशील हैं वहीं, 38 करोड़ कामगार, यानी देश के कुल कार्यबल का करीब 75 प्रतिशत, ऐसे  जगहों में काम करते हैं जिनमें उन्हें तेज गर्मी का सामना करना पड़ता है पिछले दो दशकों में अत्यधिक गर्मी और उमस के कारण काम करने की क्षमता और उत्पादकता में आई गिरावट से भारत को 624 अरब अमेरिकी डॉलर का नुकसान हुआ है। 

क्लाइमेट ट्रेंड्स की निदेशक आरती खोसला ने कहा, “जलवायु परिवर्तन भारत के लिए भविष्य का खतरा नहीं है, बल्कि आज का आर्थिक संकट है। 

अत्यधिक गर्मी का सिर्फ एक दिन अनुमानित तौर पर 3,400 अतिरिक्त मौतों का कारण बनता है। वहीं, अकेले वायु प्रदूषण के चलते वर्ष 2022 में अर्थव्यवस्था को जीडीपी के 9.5 प्रतिशत के बराबर नुकसान हुआ। अब सवाल यह नहीं है कि भारत जलवायु परिवर्तन के असर से निपटने की तैयारी पर खर्च कर सकता है या नहीं।सवाल यह है कि क्या वह और इंतजार करने की कीमत चुका सकता है? COP31 में  भारत  को

 जलवायु न्याय और जलवायु वित्त के लिए अपनी आवाज बुलंद करते रहना चाहिए। लेकिन देश की अपनी तैयारियां ऐसी अंतरराष्ट्रीय मदद पर निर्भर नहीं रह सकतीं, जिनके समय पर मिलने की कोई गारंटी नहीं है।” 

रिपोर्ट के प्रमुख निष्कर्ष 

जलवायु परिवर्तन विकास की रफ्तार धीमी कर रहा है और भारत की आर्थिक प्रगति पर असर डाल रहा है। तापमान में एक डिग्री सेल्सियस की बढ़ोतरी से फसलों की पैदावार करीब 8 प्रतिशत और 

कारखानों के राजस्व में लगभग दो प्रतिशत की गिरावट आती है। अत्यधिक गर्मी का सिर्फ एक दिन अनुमानित तौर पर 3,400 अतिरिक्त मौतों का कारण बनता है। वर्ष 2030 तक, गर्मी के तनाव 

के कारण भारत को 3.4 करोड़ नौकरियों के बराबर रोजगार का नुकसान हो सकता है और जीडीपी में पाँच प्रतिशत से ज्यादा की गिरावट आ सकती है। 

आपदाओं के कारण भारत को पहले ही हर साल 87 अरब अमेरिकी डॉलर का नुकसान हो रहा है। इनके अप्रत्यक्ष आर्थिक नुकसान प्रत्यक्ष नुकसान से 1.5 से 2.5 गुना तक ज्यादा हैं। इसका सबसे भारी बोझ उन परिवारों पर पड़ता है, जिनके पास ऐसे संकटों से उबरने के लिए सबसे कम संसाधन हैं। 

जलवायु परिवर्तन के ये असर लोगों के जीवन स्तर और विकास के वर्षों में हासिल की गई उपलब्धियों, दोनों को एक साथ नुकसान पहुंचा रहे हैं। एक तरफ लोगों की आमदनी घट रही है, तो दूसरी तरफ स्वास्थ्य, भोजन और बिजली पर खर्च बढ़ रहा है। 

स्थानीय, राष्ट्रीय और वैश्विक स्तर पर मिलकर ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो अलग-अलग क्षेत्रों पर पड़ने वाले ये असर लंबे समय तक बने रहने वाले आर्थिक नुकसान और विकास की राह में बड़ी बाधाएं बन सकते हैं। इसकी सबसे बड़ी कीमत कमजोर और संवेदनशील परिवारों तथा समुदायों को चुकानी पड़ेगी। 

जलवायु वित्त जरूरी है, लेकिन कार्रवाई के लिए इंतजार नहीं किया जा सकता 

9 से 20 नवंबर तक अंताल्या में होने वाला जलवायु परिवर्तन महासम्मेलन- COP 31 इस बात  पर जोर देगा कि जलवायु संबंधी वादों और योजनाओं को जमीन पर कैसे उतारा जाए। इसमें आपदाओं का सामना करने में सक्षम बुनियादी ढांचे, कृषि, उद्योग और वित्तपोषण पर ध्यान दिया जाएगा ।इसके साथ ही, अगले एक दशक के भीतर वैश्विक तापमान वृद्धि के 1.5 डिग्री सेल्सियस की सीमा से ऊपर जाने का खतरा भी बना हुआ है। 

अंतरराष्ट्रीय मदद का इंतजार करना भारत को बहुत महंगा पड़ सकता है। रिपोर्ट का सुझाव है कि सरकार को सार्वजनिक निवेश की योजनाओं में जलवायु जोखिमों से निपटने की तैयारी और अलग-अलग क्षेत्रों में जरूरी कदमों को शामिल करना चाहिए। सिर्फ वित्त जुटाना काफी नहीं होगा। देश के भीतर भी तैयारी और निवेश को प्राथमिकता देनी होगी। 

रिपोर्ट के मुताबिक, अगर जरूरी कदम नहीं उठाए गए, तो अगले 50 वर्षों में भारत को 35 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर से ज्यादा का नुकसान हो सकता है। इसके उलट, जलवायु जोखिमों से निपटने की क्षमता बढ़ाने के लिए लगातार निवेश किया जाए, तो 11 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर तक के आर्थिक लाभ हासिल किए जा सकते हैं। 

जलवायु सहनशीलता पर निवेश से मिल सकता है आर्थिक फायदा 

जलवायु परिवर्तन के असर को कम करने, उससे निपटने की क्षमता बढ़ाने और जलवायु के अनुकूल विकास के लिए सोच-समझकर किया गया निवेश भविष्य के नुकसान को रोक सकता है। साथ ही,  इससे आर्थिक,सामाजिक और विकास संबंधी फायदे भी मिल सकते हैं। 

रिपोर्ट का सुझाव है कि जलवायु जोखिमों को हर क्षेत्र की आर्थिक योजना का हिस्सा बनाया जाए। आपदा आने के बाद अलग अलग योजनाओं के जरिए नुकसान की भरपाई करने की कोशिश करने के बजाय, पहले से तैयारी पर ध्यान देना जरूरी है। 

बिजली का ऐसा बुनियादी ढांचा तैयार करना, जो 100 साल में एक बार आने वाली बाढ़ जैसी भीषण घटना का सामना कर सके, औसत नुकसान को 19 प्रतिशत से घटाकर 1 प्रतिशत से भी कम कर सकता है। 

दिल्ली के बस बेड़े को इलेक्ट्रिक बनाने से परिवहन क्षेत्र के उत्सर्जन में 75 प्रतिशत तक की कमी आ सकती है इससे स्वास्थ्य संबंधी खर्चों में हर साल 383 मिलियन अमेरिकी डॉलर की बचत भी हो सकती है। 

एयर कंडीशनर की ऊर्जा दक्षता बेहतर करने से बिजली क्षेत्र में 7.5 ट्रिलियन रुपये के निवेश की  जरूरत टाली जा सकती है साथ ही, वर्ष 2035 तक उपभोक्ताओं को 2.2 ट्रिलियन रुपये की बचत हो सकती है। 

जलवायु परिवर्तन के असर से निपटने की तैयारी को आपदा आने के बाद किया जाने वाला खर्च नहीं,बल्कि आर्थिक जोखिमों को पहले से संभालने की रणनीति माना जाना चाहिए। 

जलवायु सहनशीलता को विकास की रणनीति का हिस्सा बनाना होगा 

भारत में स्वच्छ ऊर्जा की ओर बढ़ते बदलाव से वर्ष 2030 तक 44 लाख हरित रोजगार पैदा हो सकते हैं। जलवायु परिवर्तन के असर से निपटने के उपायों पर खर्च किए गए हर 1 अमेरिकी डॉलर से एक दशक में लगभग 10.50 अमेरिकी डॉलर के बराबर लाभ मिल सकता है। 

रिपोर्ट का स्पष्ट संदेश है कि कदम न उठाने की कीमत, कदम उठाने की लागत से कहीं ज्यादा होगी। जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए देश के भीतर किया जाने वाला खर्च कोई अतिरिक्त बोझ नहीं, बल्कि भारत के आर्थिक भविष्य को सुरक्षित बनाने वाला निवेश है। 

 समाप्त 

क्लाइमेट ट्रेंड्स के बारे में : एक शोध-आधारित सलाहकार संस्था है जो जलवायु और सतत विकास पर नीति निर्माण और जन जागरूकता को सशक्त बनाने का काम करती है।

डॉ. सीमा जावेद

पर्यावरणविद  &  कम्युनिकेशन विशेषज्ञ 

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