दिल्ली विश्वविद्यालय साहित्य महोत्सव के दूसरे दिन संवाद कार्यक्रम में बॉलीवुड के जाने-माने कलाकार पंकज त्रिपाठी ने वक्ता के रूप में भाग लिया। इस अवसर पर नौटंकी के नाम से आयोजित संवाद में डॉ शांतनु बोस ने उनके साथ विस्तार से चर्चा की। चर्चा के दौरान एक प्रश्न के उत्तर में त्रिपाठी ने कहा कि ठहराव बहुत अद्भुत चीज है, वह हमारे जीवन में जरूर होना चाहिए। किसान भी जमीन में बीज डालकर 15 दिन उगने का इंतजार करता है। जेन जी के लिए संदेश के सवाल पर पंकज त्रिपाठी ने कहा कि आप बहुत आगे हैं, आपके लिए कोई संदेश नहीं। इस दौरान उन्होंने विद्यार्थियों की मांग पर अपनी फिल्म का एक संवाद “आप जिस शहर में नौकर बनकर आए हैं हम मालिक हैं उसके” भी सुनाया। कार्यक्रम के आरंभ में डीयू कल्चर काउंसिल के चेयरपर्सन एवं डीयू साहित्य महोत्सव की कोर कमेटी के उपाध्यक्ष एवं कनवीनर अनूप लाठर ने पंकज त्रिपाठी को शॉल ओढ़ाकर सम्मानित किया।
नई दिल्ली 13 फरवरी। राजनीति में आने के सवाल पर त्रिपाठी ने कहा कि राजनीति में अच्छे लोगों का आना चाहिए, वहां पहले से बहुत अच्छे लोग हैं। मेरे जैसा भावुक व्यक्ति वहां परेशान हो जाएगा इसलिए मैंने ऐसा नहीं सोचा है। भोजपुरी में फिल्म बनाने को लेकर पूछे गए एक सवाल पर त्रिपाठी ने कहा कि मेरी बड़ी इच्छा हो रही है भोजपुरी में एक फिल्म बनाने और एक्टिंग करने की; हमारी मातृभाषा भोजपुरी है। उन्होंने कहा कि आप हर भाषा सीखें लेकिन अपनी मातृभाषा से भी उतना ही प्रेम व सम्मान रखें। जीवन में ज्यादा से ज्यादा भाषण सिखाना अच्छी बात है। उन्होंने युवाओं को पाठ पढ़ाते हुए कहा कि आज का पाठ समर्पण, प्रेरणा और प्रेम है। उन्होंने अपने जीवन का उदाहरण देते हुए कहा की “गेंग्स ऑफ वासेपुर” फिल्म में उन्हें सुल्तान का रोल समझ नहीं आ रहा था तो समर्पण कर दिया।
त्रिपाठी ने कहा कि जब क्लास में कोई चीज समझ ना आए तो समर्पण कर दें। जब जीवन में लगे कि कुछ नहीं आ रहा है तो उसे परमात्मा को समर्पित कर दें। उन्होंने युवाओं को प्रेरणा देते हुए कहा कि अपने काम पर लगन से लगे रहें और गांठ बांध लें कि हमें कुछ करना है; सफलता निश्चित ही मिलेगी। अपने आरंभिक जीवन के बारे में चर्चा करते हुए पंकज त्रिपाठी ने बताया कि मेरा खुद का सपना था की डीयू में एडमिशन मिले, लेकिन मेरे नंबर अच्छे नहीं आए। मैंने एनएसडी (नैशनल स्कूल ऑफ ड्रामा) में दाखिला ले लिया। उन्होंने बताया कि वह पटना के एक होटल में नौकरी करते थे, तभी थियेटर करने लगे तो मजा आने लगा। 1997 में होटल की नौकरी छोड़कर उन्होंने नेशनल स्कूल आफ ड्रामा में दाखिला ले लिया।

दास्तानगोई ने साहित्य महोत्सव में जगाई आध्यात्मिक और सांस्कृतिक चेतना
दिल्ली विश्वविद्यालय साहित्य महोत्सव के दूसरे दिन “कहत कबीर” शीर्षक से दास्तानगोई सत्र का आयोजन किया गया। यह सत्र राष्ट्रीय उर्दू भाषा प्रोत्साहन परिषद के सहयोग से आयोजित हुआ। सत्र के मुख्य वक्ता सैयद साजिद आगा ने विश्वविद्यालय द्वारा ऐसे साहित्यिक कार्यक्रमों को एक महत्वपूर्ण सांस्कृतिक पहल बताया। उन्होंने कहा कि संगीतात्मक दास्तानगोई केवल कथा-वाचन नहीं, बल्कि शब्द, स्वर और भाव का संगम है, जो श्रोताओं को इतिहास और परंपरा से जीवंत रूप में जोड़ देती है। इस अवसर पर उनकी टीम ने कबीर वाणी की प्रस्तुति सुर और लय के साथ दी। पैनल चर्चा के दौरान हल्ला बोल कार्यक्रम में जानी मानी टीवी पत्रकार एवं एंकर अंजना ओम कश्यप के साथ डीयूएलएफ़ की कोर्डिनेटर प्रो. दीप्ति तनेजा ने चर्चा की। इस चर्चा में विद्यार्थियों को पत्रकारिता से जुड़े रोचक तथ्य जानने को मिले। इनके अलावा मल्टी पर्प्ज हाल के मुख्य सभागार और ऊपरी हाल में चर्चा के अनेकों सत्र आयोजित किए गए।


डीयू कल्चर काउंसिल ने रग्बी स्टेडियम में दी रोचक सांस्कृतिक प्रस्तुतियां
दिल्ली यूनिवर्सिटी लिटरेचर फेस्टिवल के दौरान रग्बी स्टेडियम में डीयू कल्चर काउंसिल ने विश्वविद्यालय के अलग-अलग कॉलेजों के साथ मिलकर रोचक सांस्कृतिक प्रस्तुतियाँ दी। समारोह के दूसरे दिन दिल्ली डीयू रजिस्ट्रार डॉ. विकास गुप्ता, कल्चर काउंसिल के चेयरपर्सन अनूप लाठर, कल्चर काउंसिल के डीन प्रो. रविंदर कुमार, कल्चर काउंसिल के जॉइंट-डीन डॉ. हेमंत वर्मा, स्पोर्ट्स काउंसिल के डायरेक्टर डॉ. अनिल कुमार कलकल और यूनिवर्सिटी लाइब्रेरियन डॉ. राजेश सिंह ने कलाकारों को पुरस्कार प्रदान किए जिसमें 2025 और 2026 में अलग-अलग जाने-माने नेशनल लेवल कॉम्पिटिशन में यूनिवर्सिटी का प्रतिनिधित्व करने वाले विद्यार्थियों को भी सम्मानित किया गया।

यूं ही ऊंची ऊंची नहीं छोड़ता मैं…
किसी भी कवि सम्मेलन की आत्मा है गीत: डॉ हरिओम पंवार
दिल्ली विश्वविद्यालय साहित्य महोत्सव में कवियों ने बिखेरे वीर और हास्य रस के रंग
नई दिल्ली, 13 फरवरी।
दिल्ली विश्वविद्यालय साहित्य महोत्सव के पहले दिन 12 फरवरी को देर शाम आयोजित सांस्कृतिक संध्या में जाने-माने कवियों ने खूब जमकर काव्य रस के रंग बिखेरे। मेरठ से आए डॉ हरिओम पंवार, जबलपुर से सुदीप भोला, लखनऊ से कविता तिवारी, सिकंदरा राव से विष्णु सक्सेना, गुरुग्राम से डॉ अशोक बत्रा, दिल्ली से प्रदीप देशवाल, इटावा से रोहित चौधरी, प्रयागराज से अटल नारायण और लुधियाना से आए हास्य कवि जटवानी ने अलग अलग रस की कविताओं से करीब तीन घंटे तक श्रोताओं को बांधे रखा।
डॉ हरिओम पंवार ने कहा कि गीत किसी भी कवि सम्मेलन की आत्मा है। उन्होंने अपने शब्दों “आसमान के तारे नहीं तोड़ता मैं, यूं ही ऊंची ऊंची नहीं छोड़ता मैं, मैं भारत के अंतर मन को गाता हूं…” के माध्यम से अपनी राष्ट्रभक्ति की कविता पर भी खूब तालियां बटोरी। डॉ सुदीप भोला ने वीर रस के रंग बिखेरते हुए कुछ इस प्रकार से दर्शकों को मंत्र मुक्त किया “हुए हैं कितने अत्याचार, छले हैं जाने कितनी बार… सहे हैं कितने नरसंहार…”
युवा कवित्री कविता तिवारी ने अपने औजस्वी गीत काव्य “पैदा हर सांस में लगन कर ले, जन्नत से बढ़कर वतन कर ले, जय हिंद- जय हिंद – वंदे मातरम, कभी-कभी ऐसे भी भजन कर ले…” पर जमकर तालियां बटोरी। कवि विष्णु सक्सेना ने अपने प्रेम गीत से श्रोताओं को देर तक तालियां बजाने पर मजबूर कर दिया। सक्सेना के शब्द कुछ यूं रहे, “आईना बन के गुजारी है जिंदगी, मैं टूट जाऊंगा बिखरने से बचा ले मुझे…”
कवि सम्मेलन के दौरान मंच संचालन गुरुग्राम से आए हास्य कवि डॉ अशोक बत्रा ने बड़े ही चुटिले अंदाज में किया। दिल्ली से प्रदीप देशवाल ने शहीद भगत सिंह की माता जी और शहीद भगत सिंह जी के जेल के साथी बटुकेश्वर दत्त के आजादी के बाद मिलन के मार्मिक दृश्य का काव्य में वर्णन किया। इटावा से आए रोहित चौधरी और प्रयागराज से आए अटल नारायण ने वीर रस से सराबोर किया तो लुधियाना से आए हास्य कवि जटवानी ने हिंदी व पंजाबी कविताओं के माध्यम से हास्य रस के रंग बिखेरे।
Anoop Lather
Consultant
Media Relations/ PRO
University of Delhi





