Lakhimpur Kheri News: उत्तर प्रदेश के लखीमपुर खीरी में स्थापित किए जा रहे देश के पहले बड़े बायोपॉलीमर प्लांट के लिए बेल्जियम से लाई जा रही 164 टन वजनी सायक्लोजेसन रिएक्टर मशीन इन दिनों चर्चा का विषय बनी हुई है। इस विशाल मशीन को सड़क मार्ग से लखीमपुर पहुंचाने के लिए 260 पहियों वाला मल्टी-एक्सल ट्रक, 3 अतिरिक्त इंजन और करीब 62 लोगों की विशेषज्ञ टीम लगातार साथ चल रही है।
बेल्जियम से लखीमपुर तक हजारों किलोमीटर का सफर
लखीमपुर खीरी के कुंभी स्थित बलरामपुर शुगर मिल में बड़े स्तर पर बायोपॉलीमर प्लांट स्थापित किया जा रहा है। इसी प्लांट में इस्तेमाल होने वाली साइक्लोन रिएक्टर मशीन को बेल्जियम से भारत लाया गया है।
मशीन पहले समुद्री मार्ग से भारत पहुंची और ओडिशा के पारादीप बंदरगाह पर उतारी गई। इसके बाद इसे सड़क मार्ग से झारखंड और बिहार होते हुए उत्तर प्रदेश लाया जा रहा है।
फिलहाल यह विशाल ट्रक वाराणसी पहुंच चुका है और अब इसे गाजीपुर, गोरखपुर, बस्ती और बलरामपुर होते हुए लखीमपुर खीरी के कुंभी तक ले जाया जाएगा।
308 पहियों से घटकर 260 पहियों का हुआ ट्रक
इस मशीन को लेकर एक दिलचस्प बात यह भी है कि जब यह ट्रक ओडिशा से उत्तर प्रदेश के लिए रवाना हुआ था, तब इसमें कुल 308 पहिए थे।
रास्ते और परिस्थितियों को देखते हुए ट्रेलर के कुछ हिस्सों को हटाया गया। इसके बाद मशीन को अब 260 पहियों वाले मल्टी-एक्सल ट्रेलर पर आगे ले जाया जा रहा है।
इतने बड़े और भारी उपकरण को सुरक्षित तरीके से ले जाने के लिए विशेष रूट प्लान तैयार किया गया है। रास्ते में आने वाले पुल, सड़क, मोड़, ऊंचाई और अन्य संभावित बाधाओं को पहले से चिन्हित किया गया है।
तीन अतिरिक्त इंजन भी चल रहे साथ
164 टन की इस भारी मशीन को खींचना सामान्य ट्रक के लिए संभव नहीं है। इसलिए इसके साथ तीन अतिरिक्त इंजन भी चल रहे हैं।
समतल सड़क पर मुख्य इंजन से मशीन को आगे बढ़ाया जाता है, जबकि चढ़ाई या कठिन रास्ते पर अतिरिक्त इंजनों की मदद ली जाती है। यही वजह है कि इस पूरे काफिले को आगे बढ़ाने के लिए विशेष तकनीकी टीम लगातार निगरानी कर रही है।
62 लोगों की टीम निभा रही अहम भूमिका
इस पूरे ऑपरेशन के साथ जे.एम. बक्शी हेवी लॉजिस्टिक्स की करीब 62 कर्मचारियों की टीम चल रही है। टीम में अलग-अलग तकनीकी और संचालन से जुड़े विशेषज्ञ शामिल हैं।
इनका काम सिर्फ ट्रक चलाना नहीं है। रास्ते की निगरानी, ट्रैफिक मैनेजमेंट, सुरक्षा, मशीन की स्थिति, परमिशन और संभावित बाधाओं से निपटना भी इस अभियान का हिस्सा है।
कंपनी के सीनियर प्रोजेक्ट मैनेजर अनेक भारती के मुताबिक, मशीन को बेल्जियम से उत्तर प्रदेश तक पहुंचाने की पूरी प्रक्रिया में अब तक करीब छह महीने लग चुके हैं। इसमें आवश्यक कागजी कार्रवाई और विभिन्न अनुमतियां लेने का समय भी शामिल है।
पारादीप से यूपी तक लगा करीब चार महीने का समय
अनेक भारती के अनुसार, पारादीप बंदरगाह से उत्तर प्रदेश तक मशीन को सड़क मार्ग से लाने में लगभग चार महीने का समय लगा है।
इतने बड़े आकार और वजन वाले उपकरण को सामान्य माल की तरह एक स्थान से दूसरे स्थान तक नहीं ले जाया जा सकता। इसके लिए पहले से रूट सर्वे, प्रशासनिक अनुमति और सड़क पर मौजूद संभावित बाधाओं का आकलन करना पड़ता है।
वाराणसी के बाद रूट क्या है?
मशीन को वाराणसी के राजातालाब रिंग रोड क्षेत्र से आगे ले जाकर प्रस्तावित रूट के अनुसार गाजीपुर → गोरखपुर → बस्ती → बलरामपुर → कुंभी (लखीमपुर खीरी) तक पहुंचाया जाना है।
अगर मौसम, सड़क और अन्य परिस्थितियां अनुकूल रहीं तो टीम के अनुसार यह विशाल मशीन अगले 2 से 3 सप्ताह में अपने गंतव्य तक पहुंच सकती है।
क्यों खास है यह मशीन?
यह मशीन जिस परियोजना के लिए लाई जा रही है, वह बायोपॉलीमर और बायोप्लास्टिक निर्माण से जुड़ी है। बायोपॉलीमर को पारंपरिक पेट्रोलियम-आधारित प्लास्टिक के विकल्प के तौर पर विकसित किया जाता है।
बलरामपुर शुगर मिल, कुंभी में प्रस्तावित परियोजना को इसी दिशा में एक महत्वपूर्ण औद्योगिक पहल के रूप में देखा जा रहा है। मशीन के पहुंचने और प्लांट की स्थापना के बाद यहां बड़े पैमाने पर बायोपॉलीमर निर्माण की प्रक्रिया को आगे बढ़ाया जाएगा।
महीनों से ट्रक ही बना अस्थायी घर
इस पूरे अभियान की एक और खास बात यह है कि टीम के कई कर्मचारी पिछले कई महीनों से इसी विशालकाय ट्रक के साथ लगातार यात्रा कर रहे हैं।
अनेक भारती के अनुसार, वरिष्ठ अधिकारियों को छोड़ दें तो टीम के अधिकांश कर्मचारियों के लिए पिछले कई महीनों से यही यात्रा उनका अस्थायी घर बनी हुई है।
निष्कर्ष
बेल्जियम से भारत और फिर पारादीप से उत्तर प्रदेश तक 164 टन की सायक्लोजेसन रिएक्टर मशीन को पहुंचाना अपने आप में एक बड़ा लॉजिस्टिक ऑपरेशन है। 308 से 260 पहियों वाले ट्रेलर में बदलाव, तीन अतिरिक्त इंजन और 62 लोगों की टीम इस पूरे अभियान को खास बनाती है।
अब सभी की नजर इस विशाल मशीन के लखीमपुर खीरी के कुंभी पहुंचने पर है, जहां इसका इस्तेमाल प्रस्तावित बायोपॉलीमर प्लांट में किया जाएगा।

