नई दिल्ली, 12 सितंबर 2026: नोबेल शांति पुरस्कार से सम्मानित कैलाश सत्यार्थी की नई पुस्तक ‘करुणा: समाधान की शक्ति’ के लोकार्पण एवं परिचर्चा का आयोजन 11 सितंबर 2026, शुक्रवार को एमिटी यूनिवर्सिटी, नोएडा में किया गया। कार्यक्रम में पुस्तक के केंद्रीय विचार—करुणा को व्यक्तिगत, सामाजिक और वैश्विक समस्याओं के समाधान की शक्ति के रूप में देखने—पर विस्तार से चर्चा हुई।

कार्यक्रम में राज्यसभा के उपसभापति श्री हरिवंश जी ने करुणा के संदर्भ में स्वामी विवेकानंद के प्रसंग का उल्लेख करते हुए कहा, ‘करुणा मुझे विवेकानंद में दिखाई देती है। विवेकानन्द जी का परिवार भूखा था। लेकिन जब वो देवी से परिवार के लिए कुछ खाना मांगने गए तो सबके कल्याण की कामना करके लौट आए। अपने परिवार का दुख भूल जाते हैं, यही करुणा है।’

कैलाश सत्यार्थी जी ने कहा, ‘बाल मजदूरी के कारण गरीबी है। गरीबी के कारण बाल मजदूरी नहीं है। इसलिए हमने कोशिश की कि दुनिया में बाल मजदूरी समाप्त हो। जब तक एक भी बच्चा दुनिया में गुलाम है तब तक समझो मानवता अभी सभ्य नहीं हुई है।’

पुस्तक लिखने के पीछे की सोच पर प्रकाश डालते हुए कैलाश सत्यार्थी जी ने कहा, ‘करुणा पर किताब लिखने पर कुछ मित्रों ने कहा कि क्या आप सन्यास लेने की सोच रहे हैं। क्योंकि करुणा को लोग अध्यात्म से जोड़ते हैं। लेकिन करुणा अध्यात्म नहीं, हमारी समस्याओं के समाधान की शक्ति है। मैं अपने देश में अनेक समस्याएँ देखता हूँ। अन्याय, विषमता, भेद इन सबका समाधान करुणा से हो सकता है।’

कार्यक्रम में प्रो. डॉ. गुरिंदर सिंह ने कहा,’कैलाश सत्यार्थी के जीवन का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा नोबेल शांति पुरस्कार नहीं, बल्कि वह क्षण है, जब उन्होंने हजारों-लाखों शोषित बच्चों के अधिकार के लिए खड़े होने का निर्णय लिया।’

वरिष्ठ लेखक एवं आलोचक पुरुषोत्तम अग्रवाल ने कहा, ‘करुणा की बात करते हुए हमें सावधान रहना चाहिए कि हम व्यक्ति की बात करते हुए व्यवस्था को क्लीन चिट न दें। करुणा – समाधान की शक्ति पुस्तक की यही खासियत है कि वह व्यक्ति पर केन्द्रित होते हुए व्यवस्था को क्लीन चिट नहीं देती।’

प्रसिद्ध लेखिका नासिरा शर्मा ने कहा, ‘हम रिपोर्टिंग करते हुए ध्यान रखना चाहिए कि उसमें करुणा हो, वह सनसनीखेज न बने। आज हम अपने रोज से आचरण में करुणा क्यों नहीं ला सकते। पेड़ मेरा पहला प्रेम है, लेकिन आज पेड़ों के प्रति हमारा रवैया करुणामय नहीं है। जानवरों के प्रति हमारे आचरण में कोई करुणा नहीं है। जबकि पहले ऐसा नहीं था। हम इंसान ही पुराने रिश्तों को भूल रहे हैं।

वेद प्रकाश ने  कहा,’भगवान बुद्ध की कहानी सुनाकर करुणा की परिभाषा बताई। करुणा केवल बुद्ध के विचार को सुनना नहीं बल्कि बुद्ध के विचारों को जीवन में उतारना है। गांधी की करुणा में सत्य, अहिंसा शामिल है जबकि अंबेडकर की करुणा में सत्य अहिंसा के साथ समता भी शामिल है।’

पुस्तक के बारे में

‘करुणा: समाधान की शक्ति’ में कैलाश सत्यार्थी करुणा को केवल एक भावना नहीं, बल्कि परिवर्तन और समाधान की शक्ति के रूप में प्रस्तुत करते हैं। पुस्तक की शुरुआत एक विचारोत्तेजक प्रश्न से होती है:

“मैं एक ऐसी दुनिया की कल्पना करता हूँ जहाँ करुणा ही एकमात्र समाधान है। क्या आप भी वही देखते हैं जो मैं देखता हूँ?”

पुस्तक में आगे कहा गया है:

हमारी दुनिया इतनी समृद्ध, इतनी जानकार और तकनीकी रूप से इतनी उन्नत कभी नहीं रही। फिर भी आज हम एक अभूतपूर्व संकट का सामना कर रहे हैं: मानवता हिंसा, असमानता और उदासीनता से जूझ रही है। यह अनिवार्य हो गया है कि हम जीवन और समाज के विषय में अपने दृष्टिकोण पर पुनर्विचार करें, और यह अभी करें। इसका उत्तर करुणा में निहित है। करुणा कोई कोमल या दुर्बल भावना नहीं है, बल्कि परिवर्तन लाने की बड़ी शक्ति है। यह सीमाओं, विचारधाराओं, धर्मों और राजनीति से परे है। और उसके लिए हमें बस इतना करना है: कि जागरूक रहकर अपना कर्म करें, मानो पूरी दुनिया एक परिवार हो—क्योंकि वास्तव में ऐसा ही है।

नोबेल शांति पुरस्कार से सम्मानित कैलाश सत्यार्थी पिछले पाँच दशकों से दुनिया भर में हाशिए पर पड़े करोड़ों वंचित लोगों के अधिकारों और गरिमा के लिए संघर्ष कर रहे हैं। उनके लिए करुणा जीवन जीने का एक तरीका है। अपनी नई पुस्तक में वे बताते हैं कि करुणा किस तरह हमारी व्यक्तिगत, सामाजिक और वैश्विक समस्याओं का समाधान है और एक बेहतर भविष्य की कुंजी बन सकती है।

लेखक के बारे में

कैलाश सत्यार्थी को वर्ष 2014 में नोबेल शांति पुरस्कार से सम्मानित किया गया। उन्होंने पाँच दशकों से अधिक समय अपना जीवन दुनिया भर के वंचित बच्चों और समुदायों के अधिकारों एवं गरिमा की रक्षा के लिए समर्पित किया है।

उनका मानना है कि करुणा एक न्यायपूर्ण, समानतापूर्ण, शांतिपूर्ण और टिकाऊ दुनिया के निर्माण की सबसे शक्तिशाली शक्ति है, और यही वह मूल्य है जो व्यक्तियों, संस्थानों और समाजों के सोचने तथा कार्य करने के तरीके का मार्गदर्शन करना चाहिए।

संलग्न: पुस्तक का कवर एवं event फोटोग्राफ

साक्षात्कार, समीक्षा एवं फीचर के लिए संपर्क:

अर्चना उपाध्याय

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